ब्रज के गीत छोड़ रहे म्यूजिक की दुनिया में छाप, बॉलीवुड संगीतकार भी हुए आकर्षित
ब्रज क्षेत्र के गीत, संगीत, भजन और लोकगीत अपनी अनूठी मिठास, गहरी भक्ति भावना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। इन गीतों को ढोलक, मजीरा, खंजरी, मृदंग और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की खास धुन से पिरोया जाता है, जो कानों को सुकून देने के साथ मन में एक विशेष आनंद भर देते हैं।
ब्रज गीतों के अंतरे और मुखड़े का प्रयोग बॉलीवुड में लगातार होता आया है। लोकधुन और ब्रज के भाव संगीतकारों को भी आकर्षित कर रहे हैं, जिससे ब्रज क्षेत्र के कलाकारों को म्यूजिक, कंपोजिंग, मिक्सिंग-मास्टरिंग व निर्देशन जैसे क्षेत्रों में काम मिल रहा है। ‘पायल की खनक’, ‘तू कौन से गांव की छोरी’, ‘आई है दिवाली आएंगे भगवान’, ‘पल्लू लटके’ और ‘दुनिया चांद पर मर गई’ जैसे गीत खासी लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं।
संगीत विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में ब्रज के इन लोक गीतों का बॉलीवुड में और अधिक इस्तेमाल होने की उम्मीद है। ब्रज संगीत का इतिहास भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और ब्रज संस्कृति से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत प्राचीन काल में मानी जाती है। मध्यकाल में सूरदास, मीरा बाई और रसखान जैसे संत-कवियों ने ब्रज भाषा में रचनाएं लिखीं, जिन्हें लोक धुनों पर गाया गया। समय के साथ यह संगीत मंदिरों, लोक उत्सवों और होली जैसे पर्वों का अभिन्न हिस्सा बन गया।
ब्रज भाषा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए कई गानों को यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। ‘पायल की खनक’ जैसे गाने दुनियाभर में प्रसिद्ध हुए हैं, जिन्हें 10 महीने में 144 मिलियन से अधिक व्यूज मिले हैं। ‘आई है दिवाली आएंगे भगवान’ और ‘दुनिया चांद पर मर गई’ जैसे गानों को भी लोगों ने खूब सराहा है।
भारतीय संगीत को पहचान दिलाने में ब्रज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बिंदु महाराज, सूरदास, हरिदास महाराज जैसे कलाकार ब्रज की धरोहर हैं। वर्ष 1960 से अब तक बॉलीवुड में ब्रज भाषा, धुन और लोकगीत अपनी धूम मचा रहे हैं। ‘राधा कैसे न जले’, ‘मोहे पनघट पे नंदलाल’, ‘श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम’, ‘यशोमती मैया से बोले नंदलाला’, ‘होली खेले रघुवीरा’ और ‘आज बिरज में होली रे रसिया’ जैसे गाने सदाबहार हैं। क्षेत्र के गाने हरियाणा, भोजपुरी और राजस्थानी गानों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
ब्रज क्षेत्र में बने गीत देशभर में चर्चित हो रहे हैं। बॉलीवुड गानों में ढोलक, सारंगी, हारमोनियम और मंजीरे की धुनें मंत्रमुग्ध कर देती हैं। वर्ष 1960 से ही ब्रज के शब्दों को गानों में पिरोया जाता रहा है। राधा-कृष्ण और ब्रज के शब्दों से शुरू होने वाले गीतों की बॉलीवुड में काफी मांग है, क्योंकि ब्रज के गीतों में मिठास और अपनेपन का अहसास होता है। आने वाले पांच वर्षों में ब्रज के गीत अपनी एक अलग पहचान बनाएंगे, क्योंकि यहां के कलाकार भाषा, गाने व संस्कृति के माध्यम से प्रसिद्धि पा रहे हैं।
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