गर्भ में 5 महीने से बड़े शिशु को भी माना जाएगा व्यक्ति: हाईकोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि गर्भ में पल रहे, पांच माह से अधिक उम्र के शिशु को भी कानून की नजर में ‘व्यक्ति’ माना जाएगा तथा उसकी मौत पर अलग से मुआवजा दिया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि गर्भस्थ शिशु की मृत्यु को एक स्वतंत्र जीवन की हानि के रूप में देखा जाएगा।
यह फैसला एक ऐसे मामले में आया है जहाँ रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने एक गर्भवती महिला की मृत्यु पर मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन दुर्घटना में मृत गर्भस्थ शिशु के लिए कोई मुआवजा नहीं दिया गया था। परिजनों द्वारा इस फैसले को चुनौती देने पर हाईकोर्ट ने कहा कि गर्भस्थ शिशु भी एक स्वतंत्र जीवन है और यदि उसकी मृत्यु दुर्घटना के कारण होती है, तो इसे बच्चे की मृत्यु के समान माना जाएगा।
अदालत ने रेलवे अधिनियम के तहत अप्रत्याशित दुर्घटनाओं में रेलवे की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए ट्रिब्यूनल के आदेश में संशोधन किया। इसके तहत, मृत महिला के लिए दिए गए 8 लाख रुपये के मुआवजे के अतिरिक्त, गर्भस्थ शिशु की मृत्यु पर भी 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। इस प्रकार कुल मुआवजा 16 लाख रुपये होगा, जिस पर वही ब्याज दर लागू होगी जो पहले निर्धारित की गई थी। इस निर्णय से उन मामलों में परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी जहाँ वे दुर्घटनाओं में अपने अजन्मे बच्चों को खो देते हैं।
