दिल्ली के बेला एस्टेट में वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर बढ़ा विवाद, बीएलओ और कांग्रेस के दावे आमने-सामने | delhi news
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में बेला एस्टेट वोटर लिस्ट विवाद तूल पकड़ता जा रहा है। मतदाता सूची से 728 नामों को हटाए जाने के बाद से प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रप्रत्युप आरोप का दौर शुरू हो गया है। इस पूरी प्रक्रिया ने मतदाता सत्यापन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर भी बहस छिड़ गई है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने इस पूरी घटना को ‘वोट चोरी’ का एक क्लासिक उदाहरण बताया है। उनका आरोप है कि सोची-समझी रणनीति के तहत एक बड़े वर्ग के मताधिकार को छीना गया है। इस बीच, चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ ने इन आरोपों के उलट बयान दिया है। बीएलओ का कहना है कि जब वे सत्यापन के लिए मौके पर गईं, तो वहां कोई भी मकान या बस्ती नहीं मिली। उनके मुताबिक, वह इलाका पूरी तरह सुनसान था और दस्तावेजों में दर्ज पतों पर कोई बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं था।
सामने आए दस्तावेजों और फॉर्म्स की जांच से पता चलता है कि बड़ी संख्या में आवेदनों में एक ही सामान्य पता जैसे “एग्रीकल्चर जेजे बेला एस्टेट” या “एग्रीकल्चर लैंड” दर्ज किया गया था। कई फॉर्म्स की लिखावट एक जैसी होने की बात भी सामने आई है, जिससे फर्जीवाड़े की आशंका जताई जा रही है। बीएलओ ने दावा किया है कि उन्होंने पूरी पारदर्शिता के साथ अपनी रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को सौंप दी है और उनके पास इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी मौजूद है।
दूसरी ओर, स्थानीय स्तर पर रह रहे लोगों का दर्द कुछ और ही बयां करता है। दशकों से वहां रह रहे निवासियों का कहना है कि उनके पास वैध पहचान पत्र, वोटर आईडी और बैंक खाते होने के बावजूद उनके नाम सूची से हटा दिए गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी ठोस कारण के उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जमीनी हकीकत और कागजी दस्तावेजों के बीच इस बड़े विरोधाभास की असल वजह क्या है।
