समाजवादी पार्टी के ईमानदार विधायक आलम बदी का निधन, सादगी के कायल थे सभी | UP Politics News
समाजवादी पार्टी के पांच बार के विधायक और उत्तर प्रदेश के सबसे बुजुर्ग राजनेताओं में शुमार आलम बदी का गुरुवार को निधन हो गया। आजमगढ़ की निजामाबाद विधानसभा सीट से लगातार जीत दर्ज करने वाले आलम बदी अपनी असाधारण सादगी और ईमानदारी के लिए पूरे प्रदेश में जाने जाते थे। उनकी मृत्यु से राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई है।
आलम बदी का जीवन कई मायनों में प्रेरणादायक था। पांच बार विधायक बनने और दशकों तक राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद, उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत संपत्ति या विलासिता को महत्व नहीं दिया। वह आजमगढ़ के कुर्मीटोला मोहल्ले में एक साधारण टीनशेड वाले घर में रहते थे और सफर के लिए रोडवेज बस, साइकिल या स्कूटर का इस्तेमाल करते थे। उनके खिलाफ आज तक कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ, जो उनकी निष्कलंक छवि को दर्शाता है।
मंत्री पद ठुकराया, जनता की सेवा चुनी
समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे आलम बदी को मुलायम सिंह यादव ने अपनी सरकार में मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने इसे विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया था। उनका मानना था कि मंत्री बनने से वह आम जनता से दूर हो जाएंगे, और वह हमेशा जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं को सुनना और उनका समाधान करना चाहते थे। यह निर्णय उनकी जनसेवा के प्रति प्रतिबद्धता को उजागर करता है।
चुनावों में भी सादगी
जहां आज के दौर में चुनाव प्रचार में भारी धन खर्च होता है, वहीं आलम बदी अपने चुनाव प्रचार के दौरान पोस्टर-बैनर तक नहीं छपवाते थे। उनका कोई सोशल मीडिया अकाउंट भी नहीं था, जिससे वह सीधे जनता से जुड़े रहते थे। इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद राजनीति में आए आलम बदी ने हमेशा सादगी को अपनी पहचान बनाया।
सादगी के पीछे की प्रेरणा
अपनी सादगी के बारे में पूछे जाने पर, आलम बदी अक्सर महात्मा गांधी का उदाहरण देते थे। वह कहते थे कि गांधीजी भी बैरिस्टर थे और उनके पास धन-संपत्ति थी, लेकिन उन्होंने सब कुछ त्याग कर जनता की सेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया। आलम बदी ने भी इसी राह पर चलते हुए अपना जीवन जनता के लिए जिया।
विधायक के रूप में सफर
आलम बदी पहली बार 1996 में निजामाबाद सीट से विधायक चुने गए थे। इसके बाद उन्होंने 2002, 2012, 2017 और 2022 में भी जीत हासिल की। केवल एक बार 2007 में बसपा की लहर के दौरान उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। पिछले चुनाव में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को बड़े अंतर से हराया था। उनकी मृत्यु से समाजवादी पार्टी और उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक बड़ी क्षति हुई है।
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