लखनऊ में प्रोफेसर रामनाथ झा ने समझाया, मन, वचन और कर्म की एकता ही Indian Philosophy का आधार
लखनऊ के भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय स्थित जयशंकर प्रसाद सभागार में हाल ही में कुमारस्वामी फाउण्डेशन ने 20वें पंडित भुवनेशचन्द्र मिश्र स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में संस्कृत अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर रामनाथ झा उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान-परम्परा को एक सर्वांगपूर्ण जीवन-विधान बताया, जो जीवन जीने की सार्थक, सुव्यवस्थित और तार्किक प्रणाली को सिद्धांत और व्यवहार दोनों में प्रतिध्वनित करती है।
प्रोफेसर झा ने इस बात पर विशेष बल दिया कि भारतीय चिंतन में मन, वचन और कर्म की एकता पर बहुत जोर दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस एकता का टूटना ही पाखण्ड कहलाता है। उन्होंने श्रोताओं को Indian Philosophy के इस मूलभूत सिद्धांत से अवगत कराया, जो व्यक्ति के आंतरिक और बाहरी आचरण की शुद्धता पर केंद्रित है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर आरके मिश्र ने की। इस अवसर पर कुमारस्वामी फाउण्डेशन की वार्षिक पत्रिका ‘तत्त्व-सिन्धु’ के नवीनतम अंक का विमोचन भी किया गया, जिससे भारतीय संस्कृति और दर्शन से जुड़े विषयों पर शोध और लेखन को प्रोत्साहन मिलता है। इस तरह के व्याख्यान समाज में नैतिक मूल्यों और दार्शनिक चिंतन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
