यूपी में वोटर लिस्ट से लाखों नाम बाहर, Lucknow में बदलेंगे राजनीतिक समीकरण, UP politics news पर असर
उत्तर प्रदेश में एसआईआर (SIR) की अनंतिम सूची जारी होने के बाद राज्य के राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है। विशेष रूप से राजधानी लखनऊ की कई विधानसभा सीटों पर इसका गहरा असर देखने को मिलेगा। रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ में करीब 30.05 प्रतिशत मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हो गए हैं, जिनकी संख्या 12 लाख से अधिक है। इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटने से विधानसभा क्षेत्रों का चुनावी गणित और जातीय समीकरण दोनों प्रभावित होंगे, जिससे राजनीतिक दलों को अपनी जीत-हार की रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा। यह घटनाक्रम आगामी चुनावों में UP politics news का एक महत्वपूर्ण पहलू बन सकता है।
अनंतिम सूची के आंकड़ों पर गौर करें तो, लखनऊ कैंट विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक 39.11 प्रतिशत मतदाता सूची से बाहर हुए हैं, जो 1.45 लाख से ज्यादा है। इसके पीछे मुख्य कारण यह बताया जा रहा है कि कई मतदाता जो मूल रूप से अन्य जिलों के थे, उन्होंने अपने गृहनगर में वोटर बनने का विकल्प चुना है। उन्होंने या तो लखनऊ में एसआईआर फॉर्म नहीं भरा, या उनके घर नहीं मिले, या फिर उन्होंने अपने मूल जनपद में सूचीबद्ध होने की सूचना दे दी।
इसी तरह, उत्तर विधानसभा क्षेत्र से 38.40 प्रतिशत यानी 1.80 लाख से अधिक वोटर सूची से बाहर हुए हैं। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां बड़ी संख्या में गैर-जिलों के मतदाता निवास करते हैं। लखनऊ पूर्वी विधानसभा क्षेत्र में भी 36.61 प्रतिशत लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, जिसमें इंदिरा नगर, कल्याणपुर और महानगर जैसे प्रमुख इलाके शामिल हैं। सरोजिनी नगर में 31.42 प्रतिशत (1.12 लाख) और लखनऊ मध्य में 34.61 प्रतिशत (1.60 लाख से अधिक) मतदाताओं के नाम भी हटाए गए हैं।
लखनऊ पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में, जहां पहले 6 लाख से अधिक मतदाता थे, वहां सबसे ज्यादा 30 प्रतिशत यानी 1.82 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल माना जाता है और यहां चौक, नक्खास, राजाजीपुरम जैसे इलाके आते हैं। कुल मिलाकर, लखनऊ की 9 विधानसभा क्षेत्रों में से 6 सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं, खासकर वे क्षेत्र जिनके दायरे में विस्तारित शहरी आबादी आती है और जहां प्रदेश के अन्य जिलों से आकर लोग बसे हैं।
इसके विपरीत, ग्रामीण इलाकों वाली मलिहाबाद, बीकेटी और मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम कम संख्या में कटे हैं। मलिहाबाद में 17.41%, मोहनलालगंज में 16.93% और बीकेटी में 22.27% नाम ही सूची से कम हुए हैं। इन क्षेत्रों में लोगों ने एसआईआर फॉर्म भरने में अधिक रुचि दिखाई और बीएलओ को भी मतदाताओं को खोजने में आसानी हुई, क्योंकि लोग एक-दूसरे को जानते थे। शहरी क्षेत्रों में अक्सर पड़ोसी भी एक-दूसरे से अनजान होते हैं, जिसका खामियाजा शहरी क्षेत्रों को उठाना पड़ा है।
चुनावी परिदृश्य में किसी भी विधानसभा क्षेत्र में एक लाख वोट बहुत मायने रखते हैं, और कई बार तो हार-जीत का अंतर सैकड़ों में ही होता है। ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होने से चुनावी समीकरणों का बिगड़ना स्वाभाविक है। हालांकि, इसका असर किसी एक राजनीतिक दल पर नहीं पड़ेगा, बल्कि सभी दल इससे प्रभावित होंगे। अब चुनाव से पहले बनने वाले जातीय समीकरणों और नतीजों के पूर्वानुमान के मानकों को नए सिरे से तैयार करना होगा।
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