मंडला पेंटिंग से गायत्री ने रचा आत्मनिर्भरता का नया अध्याय, सौ से अधिक महिलाओं को मिली रोजगार की राह
बलरामपुर जिले के सुदूर पचपेड़वा ब्लॉक से एक प्रेरणादायी कहानी सामने आई है, जो साबित करती है कि हुनर और हौसले के आगे कोई भी बाधा टिक नहीं सकती। यहां की बेटी गायत्री श्रीवास्तव ने अपने बचपन के चित्रकारी के शौक को आत्मनिर्भरता के एक सशक्त माध्यम में बदल दिया है। मंडला पेंटिंग की बारीकियों को साधकर उन्होंने न केवल अपना मुकाम बनाया, बल्कि गांव की सौ से अधिक महिलाओं को रोजगार की नई राह भी दिखाई है।
गायत्री बताती हैं कि स्कूल से लेकर कॉलेज तक पेंटिंग उनका स्वाभाविक साथी रही। विवाह के बाद घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने अपनी कला को जीवित रखा। धीरे-धीरे उन्होंने मंडला पेंटिंग की जटिल ज्यामितीय शैली में दक्षता हासिल की और इसे व्यावसायिक रूप देने का साहसिक निर्णय लिया। आज उनके घर का एक कमरा एक पूर्ण स्टूडियो का रूप ले चुका है, जहां हर रोज कला का सृजन होता है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के सहयोग से गायत्री ने स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को मंडला पेंटिंग का निःशुल्क प्रशिक्षण देना शुरू किया। शुरुआत मुट्ठी भर महिलाओं से हुई, लेकिन आज यह संख्या सौ को पार कर चुकी है। प्रशिक्षित महिलाएं अब घर बैठे पेंटिंग तैयार कर अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं और परिवार में आर्थिक योगदान दे रही हैं।
गायत्री की मंडला पेंटिंग्स स्थानीय प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक आयोजनों में खूब सराही जा रही हैं। कई कृतियां हजारों रुपये में बिक चुकी हैं। कागज, कैनवास, कपड़े, पत्थर और लकड़ी जैसी विभिन्न सतहों पर बनाई जाने वाली ये पेंटिंग्स अपनी जटिलता और सौंदर्य के लिए विशेष पहचान बना रही हैं। उनके पति भी इस पूरी पहल में कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग कर रहे हैं।
गायत्री श्रीवास्तव की यह यात्रा उत्तर प्रदेश की उन लाखों महिलाओं के लिए एक जीवंत उदाहरण है, जो अपनी प्रतिभा को पहचानकर आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं। एक छोटे से गांव से उठी यह पहल आज प्रदेश स्तर पर महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरक मिसाल बन चुकी है। सरकार की ग्रामीण आजीविका योजनाओं और एक महिला की अदम्य इच्छाशक्ति के संगम ने साबित कर दिया है कि हुनर को अगर सही मंच मिले, तो वह पूरे समाज की तस्वीर बदल सकता है।
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