अरावली में 7000 साल पुरानी सभ्यता के अवशेषों पर खनन का खतरा, फतेहपुर सीकरी की रॉक पेंटिंग्स पर संकट
आगरा के फतेहपुर सीकरी क्षेत्र में अरावली की पहाड़ियों पर स्थित 7000 साल पुरानी प्रागैतिहासिक सभ्यता के अमूल्य अवशेषों को खनन माफियाओं द्वारा लगातार नष्ट किया जा रहा है। इन पहाड़ियों पर बने प्राकृतिक आवासों की छतों पर बनी शैलचित्र (रॉक पेंटिंग्स) उस युग की गवाही देती हैं जब मनुष्य ने पहली बार चट्टानों में आश्रय लेना शुरू किया था।
यह शैलचित्र लाल, गेरू और काले रंगों से बने हैं और उत्तर पाषाण काल (लगभग 7000 वर्ष पूर्व) से लेकर गुप्त काल (तीसरी शताब्दी) तक के माने जाते हैं। इनमें हिरण, मवेशी, बंदर, बाघ और शेर जैसे जानवरों के चित्र प्रमुखता से मिलते हैं। खनन के कारण इन चित्रों के अधिकांश अवशेष पहले ही नष्ट हो चुके हैं, और जो कुछ बचे हैं, वे भी स्थानीय लोगों द्वारा किए जा रहे अवैध खनन के कारण गंभीर खतरे में हैं।
पुरातत्व विभाग ने इन शैलचित्रों के संरक्षण के लिए प्रयास शुरू किए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की तकनीकी मूल्यांकन समिति ने पिछले साल अप्रैल में प्रस्तावित क्षेत्र का पुनर्मूल्यांकन करने की सिफारिश की थी। ASI के आगरा कार्यालय के अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. स्मिथा एस. कुमार ने बताया कि पांच जनवरी के बाद फतेहपुर सीकरी की रॉक शेल्टर्स का दौरा किया जाएगा ताकि उनके संरक्षण के प्रस्ताव का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके।
यह क्षेत्र ASI द्वारा संरक्षित स्मारक फतेहपुर सीकरी से मात्र चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इन शैलचित्रों पर 1959 में भी एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था, जिसमें रॉक आर्ट सोसायटी ऑफ इंडिया के सचिव डॉ. गिरिराज कुमार ने कई शैल आश्रयों की खोज की थी। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने भी जून 2023 में इन शैलचित्रों का निरीक्षण किया था। इन अमूल्य धरोहरों का संरक्षण जनमानस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये हमारे प्राचीन इतिहास और संस्कृति की अनमोल धरोहर हैं।
