वाराणसी ज्ञानवापी फैसले वाले जज रवि कुमार दिवाकर ने उठाए गंभीर सवाल, पूछा- न्यायाधीश के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए? | uttar pradesh news
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में न्यायपालिका से जुड़ा एक नया विवाद सामने आया है, जहां एक अदालत के फैसले में प्रशासनिक नियंत्रण और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर तीखी टिप्पणी की गई है [uttar pradesh news]। ज्ञानवापी मामले में फैसला देकर चर्चा में आए जज रवि कुमार दिवाकर ने एनडीपीएस एक्ट के एक मामले में सुनवाई के दौरान यह बात कही है। उन्होंने अदालत से हत्या से जुड़े 97 मामलों की पत्रावलियां वापस मंगाए जाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं, जिससे न्यायिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, मुजफ्फरनगर की अदालत में विचाराधीन करीब 10 साल पुराने एनडीपीएस मामले में फैसला सुनाते हुए जज ने न्याय प्रक्रिया में आ रही बाधाओं का जिक्र किया। उन्होंने प्रसिद्ध फिल्मी संवाद ‘तारीख पर तारीख’ का हवाला देते हुए न्याय मिलने में होने वाली देरी पर बात की। इसके साथ ही, पिछले दिनों तत्कालीन जिला जज द्वारा उनकी अदालत से 97 पत्रावलियां रिकॉल किए जाने के आदेश पर आपत्ति जताई गई। जज ने सवाल उठाया कि क्या प्रशासनिक नियंत्रण के तहत काम करने वाला न्यायाधीश ऐसे आदेश का पालन करने के लिए बाध्य है, जो उसे कानून के विपरीत प्रतीत होते हैं?
यह पूरा घटनाक्रम उस समय चर्चा का विषय बना है जब न्यायपालिका के भीतर प्रशासनिक अधिकारों और न्यायिक स्वतंत्रता के संतुलन को लेकर बहस छिड़ गई है। इस तरह के विवादों से आम जनता के बीच न्यायिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठते हैं, जो अंततः न्याय मिलने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस टिप्पणी से निचली अदालतों और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के बीच के संबंधों पर नए सिरे से विचार किया जा सकता है। अब देखना यह होगा कि इस मामले में उच्च स्तर पर क्या रुख अपनाया जाता है और इसका असर आगामी न्यायिक प्रक्रियाओं पर क्या पड़ता है।
