रूसी तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव के खिलाफ आए भारत, चीन और रूस | world news
रूस से कच्चा तेल आयात करने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव अब और अधिक कड़ा हो गया है। अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने एक विवादास्पद विधेयक को मंजूरी दे दी है। इसके तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे रूस से तेल या गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर एक सौ प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगा सकें। इस बीच, इस कानून से सीधे प्रभावित होने वाले तीन प्रमुख देशों—भारत, चीन और रूस ने अमेरिकी प्रशासन के इस कदम की कड़ी आलोचना की है। (world news)
भारत ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए दो टूक शब्दों में कहा है कि देश के चौदह करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। विदेश मंत्रालय और अमेरिका में भारतीय राजदूत ने जोर देकर कहा कि ऊर्जा की खरीद बाजार की स्थितियों, किफायती दामों और व्यावसायिक व्यवहार्यता पर आधारित है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, और देश की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से आयात जारी रहेगा। भारत के इस रुख से साफ है कि राष्ट्रीय हित हर हाल में सर्वोपरि रहेंगे।
दूसरी ओर, बीजिंग ने अमेरिकी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दायरे से बाहर बताते हुए ‘लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन’ करार दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि रूस के साथ उसका व्यापारिक सहयोग पूरी तरह से सामान्य और पारदर्शी है, जिसमें किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा। वहीं, मास्को ने इस अमेरिकी कदम को ‘गैर-दोस्ताना’ कार्रवाई बताते हुए चेतावनी दी है कि इससे यूक्रेन संकट के समाधान की दिशा में चल रहे कूटनीतिक प्रयास और अधिक जटिल हो जाएंगे।
