बढ़ता अकेलापन और स्क्रीन टाइम: ऑटिज्म के खतरे को बढ़ा रहा है बच्चों में
बच्चों में अकेलापन और मोबाइल स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताना ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) के लक्षणों को बढ़ा रहा है। यह स्थिति, जिसमें बच्चों की बातचीत, सामाजिक व्यवहार और चीजों को समझने का तरीका अलग होता है, हर 68 बच्चों में से लगभग एक को प्रभावित कर रही है। मानसिक रोग विशेषज्ञों के अनुसार, यह कोई मानसिक कमजोरी नहीं, बल्कि मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक स्थिति है।
बदलती जीवनशैली, एकल परिवारों में बच्चों का बढ़ता अकेलापन, सीमित सामाजिक मेलजोल और जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप ऑटिज्म के लक्षण वाले बच्चों की संख्या में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है। हालांकि, जेनेटिक कारण भी इसमें भूमिका निभाते हैं। घंटों मोबाइल और टीवी स्क्रीन में व्यस्त रहने से बच्चों की बोलने, ध्यान केंद्रित करने और दूसरों से जुड़ने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि हर स्क्रीन का उपयोग करने वाला बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित नहीं होता।
जागरूकता की कमी एक बड़ी चुनौती है। कई परिवार बच्चों को मंदबुद्धि या जिद्दी समझकर उनकी परेशानी को नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे सही समय पर मदद नहीं मिल पाती। ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों को दया नहीं, बल्कि समझ और सहयोग की आवश्यकता होती है। समय पर पहचान और उचित प्रशिक्षण के माध्यम से ये बच्चे भी अपनी क्षमताओं का विकास कर एक बेहतर भविष्य बना सकते हैं।
ऑटिज्म के कुछ सामान्य लक्षण:
बोलने या भाषा सीखने में देरी
नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना
आंखों से संपर्क कम करना
एक ही गतिविधि को बार-बार दोहराना
बदलाव पसंद न करना
तेज आवाज, रोशनी या स्पर्श के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होना
दूसरों से घुलने-मिलने में परेशानी
सुझाए गए उपाय:
बच्चों को मोबाइल स्क्रीन से दूर रखकर खेल और बातचीत को बढ़ावा दें।
परिवार को बच्चे के साथ नियमित रूप से समय बिताना चाहिए।
विकास में किसी भी प्रकार की देरी दिखने पर विशेषज्ञ से सलाह लें।
स्पीच थेरेपी, बिहेवियर थेरेपी और विशेष शिक्षा से सहायता मिल सकती है।
यह समस्या बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास को सीधे तौर पर प्रभावित करती है, जिससे उनके भविष्य की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है।
