IAS शाहिद इकबाल ने छात्रों से की अपील, ‘marks’ को सफलता का पैमाना न बनाएं
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शाहिद इकबाल चौधरी ने छात्रों और अभिभावकों से अपील की है कि वे शैक्षणिक अंकों को जीवन की सफलता का पैमाना न मानें। यह अपील जम्मू-कश्मीर में बोर्ड परीक्षा परिणामों के बाद छात्रों द्वारा आत्महत्या के दुखद मामलों के बीच आई है। उन्होंने कहा कि 10वीं या 12वीं के अंक भविष्य तय नहीं करते। उन्होंने खुद 10वीं में 55% अंक लाने के बावजूद यूपीएससी में 51वीं रैंक हासिल की थी।
आईएएस अधिकारी ने हाल ही में केंद्र शासित प्रदेश के कई जिलों से सामने आई घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिन बेहद विचलित करने वाले रहे हैं और ऐसी घटनाओं को हमारी सामूहिक चेतना को झकझोर देना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी परीक्षा परिणाम किसी बच्चे की जान जाने का कारण नहीं बन सकता।
अंकों को लेकर तुलना और सार्वजनिक अपमान की संस्कृति की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि हर साल इंटरनेट मीडिया पर 85 या 90 प्रतिशत अंक लाने वाले छात्रों को लेकर भी निराशा और शर्मिंदगी जताई जाती है। उन्होंने लिखा कि तुलना, दिखावे और मौन अपमान की यह संस्कृति एक वार्षिक रस्म बन चुकी है। यह अस्वस्थ, अव्यावहारिक और खतरनाक है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए शाहिद इकबाल ने बताया कि देश में हर साल लगभग 14 हजार छात्र आत्महत्या करते हैं, जिनमें से कई मामलों का संबंध शैक्षणिक दबाव, परीक्षा में असफलता या परिवार और समाज को निराश करने के डर से होता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि कक्षा 10 और 12 के बोर्ड परीक्षा परिणाम कभी भी जीवन की दिशा तय नहीं करते।
अपने विदेशी शैक्षणिक अनुभव का उल्लेख करते हुए शाहिद इकबाल ने बताया कि कई देशों में शिक्षा व्यवस्था अंकों के पीछे नहीं भागती बल्कि पास-फेल या व्यापक ग्रेडिंग प्रणाली अपनाई जाती है, जिसमें अवधारणात्मक समझ, रचनात्मकता, जिज्ञासा और कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाती है। उन्होंने कहा कि समाज को केवल कक्षा 10 के टॉपर नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, उद्यमियों, कलाकारों, नीति विशेषज्ञों, न्यायाधीशों और नवाचार करने वालों की आवश्यकता है।
