जब इंदिरा गांधी के ज्योतिषी ने तय की थी आम चुनाव की तारीख, जानें चुनाव आयोग के अनसुने किस्से | elections history
राजनीतिक गलियारों में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कामकाज के तरीकों को लेकर अक्सर बहस छिड़ती रहती है। वर्तमान राजनीतिक माहौल के बीच यदि इतिहास पर नजर डालें, तो पता चलता है कि पूर्व में भी सरकार और चुनाव आयोग के संबंध काफी दिलचस्प रहे हैं। बात साल 1977 की है, जब देश आपातकाल की मार झेल रहा था और नागरिक अधिकार प्रभावित थे। उस दौर में अचानक 18 जनवरी 1977 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित करते हुए लोकसभा भंग करने और मार्च में नए चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी।
राजनीतिक इतिहास और संस्मरणों के मुताबिक, इस बड़े फैसले से पहले की पटकथा काफी गोपनीय तरीके से लिखी गई थी। दिसंबर 1976 के आखिरी हफ़्ते में ही इंदिरा गांधी ने मन बना लिया था कि उन्हें आपातकाल समाप्त करना है और चुनाव कराना है। उन्होंने अपने करीबी सहयोगियों से यहाँ तक कहा था कि उन्हें अपनी हार का अंदेशा है, लेकिन देशहित में यह कदम उठाना जरूरी है। इसके बाद उनके प्रधान सचिव ने तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी. स्वामीनाथन को एक अनौपचारिक बैठक में बुलाया और बिना किसी औपचारिक कागजी प्रक्रिया के शुरुआती तैयारियां शुरू करने को कहा था।
ऐतिहासिक दस्तावेजों और जानकारों के लेखों के अनुसार, चुनाव की तारीखों के निर्धारण में ज्योतिषीय गणनाओं का भी सहारा लिया गया था। इंदिरा गांधी के ज्योतिषी द्वारा सुझाई गई तिथियों के आधार पर ही चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। हालांकि, इस चुनाव में इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी ने भारी बहुमत के साथ सत्ता हासिल की। इस तरह के ऐतिहासिक किस्से यह दर्शाते हैं कि भारतीय लोकतंत्र और चुनाव आयोग के सफर में कई अनसुने और रोचक अध्याय जुड़े हुए हैं, जो आज भी राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान करते हैं।
