आगरा उत्तरी बाइपास खाली, शहर में भारी वाहनों से खतरा; सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, agra news
आगरा का उत्तरी बाइपास पूरी तरह चालू होने के बावजूद भारी वाहन शहर के बीच से गुजर रहे हैं, जिससे आम नागरिकों का जीवन लगातार खतरे में बना हुआ है। 400 करोड़ रुपये की लागत से तैयार यह बाइपास खाली पड़ा है, जबकि राष्ट्रीय राजमार्ग पर हादसों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क-सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि यह समस्या केवल आगरा शहर की नहीं है, बल्कि उन सभी शहरों की है जहां राष्ट्रीय राजमार्ग घनी आबादी के बीच से होकर गुजरते हैं। आगरा देश के सर्वाधिक हादसों वाले 100 शहरों में शामिल है। वर्ष 2025 में आगरा में 1350 से अधिक सड़क हादसों में 700 से अधिक लोगों की जान गई थी।
बाइपास का उद्देश्य और वर्तमान स्थिति
उत्तरी बाइपास का निर्माण दिल्ली से कानपुर और आगे जाने वाले भारी वाहनों को शहर में प्रवेश करने से रोकने के लिए किया गया था। यह 14 किलोमीटर लंबा बाइपास शहर की भीड़, चौराहों और बार-बार रुकने की मजबूरी से बचाता है। इसके बावजूद, आज भी प्रतिदिन लगभग 50 हजार भारी वाहन शहरी हिस्से से गुजर रहे हैं। ये वाहन स्कूलों, अस्पतालों, बस अड्डों और रिहायशी इलाकों के बीच से तेज़ गति से निकलते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है।
समन्वय की कमी बनी बाधा
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था और तालमेल की कमी है। उत्तरी बाइपास का मुख्य मोड़ रैपुरा जाट है, जो मथुरा जिले की सीमा में आता है। इस वजह से यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि भारी वाहनों को रोकने और उन्हें बाइपास पर मोड़ने की जिम्मेदारी किस प्रशासन की है। आगरा और मथुरा जिलों के बीच स्पष्ट निर्देश और तालमेल न होने से यह महत्वपूर्ण सड़क अपना पूरा लाभ नहीं दे पा रही है।
समाधान के तौर पर याचिका में सुझाव दिया गया है कि यदि दूरी के अनुसार एकीकृत शुल्क व्यवस्था लागू की जाए, तो बाइपास का उपयोग स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। शहर के बीच से गुजरने पर दूरी लगभग 34 किमी है, जबकि बाइपास से यह दूरी केवल 38 किमी है, यानी अंतर सिर्फ चार किलोमीटर का है।
