यूपी वोटर लिस्ट में बड़े शहरों से ‘छंटनी’: बदलेगा चुनावी समीकरण, जानें क्या है संकेत
उत्तर प्रदेश की नई ड्राफ्ट मतदाता सूची के पुनरीक्षण के बाद बड़े शहरों के चुनावी समीकरणों में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। प्रदेश भर से करीब 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिनमें से अधिकांश वे लोग हैं जो रोजगार की तलाश में बड़े शहरों में रहते थे और अब अपने गृह जनपदों की मतदाता सूची में शामिल हो गए हैं। यह स्थिति शहरी विधानसभा सीटों पर जीत-हार के पुराने समीकरणों को बदल सकती है।
बड़े शहरों से पलायन का असर
सर्वाधिक नाम कटने वाले टॉप टेन जिलों में मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दबदबा है। अकेले लखनऊ से 12 लाख, प्रयागराज से 11.56 लाख और आगरा से 8.36 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। यह स्पष्ट दर्शाता है कि बड़े शहरों से मतदाताओं का पलायन छोटे जिलों की ओर हुआ है। इस बदलाव का सीधा असर शहरी क्षेत्रों की सीटों पर पड़ेगा, जहां चुनावी गणित नए सिरे से तय करना होगा।
क्षेत्रवार प्रभाव और कम बदलाव वाले इलाके
क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो मध्य और पश्चिमी यूपी में इसका सबसे अधिक प्रभाव दिख रहा है, जहां टॉप 10 जिलों में से 8 इसी क्षेत्र के हैं। इसके विपरीत, बुंदेलखंड जैसे इलाकों में सबसे कम बदलाव हुए हैं। महोबा, हमीरपुर और ललितपुर जैसे जिलों में नाम कटने की संख्या सबसे कम है, जिससे इन क्षेत्रों के सियासी समीकरणों में बड़े फेरबदल की संभावना कम है।
स्थानांतरित और दोहरे नाम वाले मतदाता
कुल 2.89 करोड़ मतदाताओं में से 2.17 करोड़ लोग स्थानांतरित या अनुपस्थित मतदाता हैं, जिन्होंने बड़े शहरों से अपने गृह जनपदों में नाम जुड़वाया है। इसके अतिरिक्त, 25.47 लाख ऐसे मतदाता थे जिनके नाम दो जिलों में दर्ज थे और उन्होंने अब अपने पैतृक जिलों को प्राथमिकता दी है। यह भी बड़े शहरों से मतदाताओं के हटने और छोटे जिलों में उनके नाम जुड़ने का एक कारण है।
पूर्वांचल और अन्य जिलों के आंकड़े
मध्य यूपी के लखनऊ, प्रयागराज, कानपुर नगर और सीतापुर के अलावा पश्चिम यूपी के आगरा, गाजियाबाद, बरेली और मेरठ में भी बड़ी संख्या में नाम कटे हैं। पूर्वांचल में गोरखपुर और जौनपुर जैसे बड़े जिलों में भी क्रमशः 6.45 लाख और 5.89 लाख मतदाताओं के नाम कटे हैं। यह दर्शाता है कि बड़े शहरों से आसपास के छोटे जिलों में मतदाताओं का स्थानांतरण हुआ है, जिससे इन सीटों पर भी प्रत्याशियों को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। बुंदेलखंड के जिलों में नाम कटने की संख्या काफी कम है, जो वहां के चुनावी समीकरणों में स्थिरता का संकेत देता है।
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