योगी मंत्रिमंडल विस्तार पर सपा की नजर, PDA को कसौटी पर कसने की तैयारी
समाजवादी पार्टी (सपा) ने लोकसभा चुनाव में ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की सफलता के बाद अब इसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए और मजबूत बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। सपा की निगाहें उत्तर प्रदेश में होने वाले संभावित मंत्रिमंडल विस्तार पर टिकी हैं। यदि मंत्रिमंडल का विस्तार होता है, तो सपा पीडीए को दी गई हिस्सेदारी को अपनी कसौटी बनाएगी। इस आधार पर, सपा अपने संगठन में भी पीडीए की हिस्सेदारी को और बढ़ाकर इसे विधानसभा चुनाव में एक प्रमुख हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगी।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। पारंपरिक रूप से यादव और मुस्लिम समीकरणों पर आधारित राजनीति करने वाली सपा ने हाल के वर्षों में इस रणनीति में बदलाव किया है। लोकसभा चुनाव 2024 में सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा अपनाया गया पीडीए फॉर्मूला काफी सफल रहा, जिसमें उन्होंने पिछड़े, दलितों के साथ अल्पसंख्यकों की पार्टी में हिस्सेदारी बढ़ाई। विशेष रूप से, यादवों के साथ कुर्मी बिरादरी को तरजीह दी गई, जिसका सीधा लाभ मिला। कुर्मी बिरादरी के कुल 11 सांसदों में से सपा के सात सांसद हैं।
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में तेजी से जुटे हुए हैं। इस प्रक्रिया में, निष्क्रिय नेताओं को हटाकर मेहनती कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसी खबरें हैं कि सपा उत्तर प्रदेश में होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार का इंतजार कर रही है, ताकि यह देखा जा सके कि दलितों और पिछड़ों की बात करने वाली भाजपा पीडीए को मंत्रिमंडल में कितनी अहमियत देती है। इसके बाद पार्टी संगठन में कुछ फेरबदल किए जाएंगे।
संगठन से लेकर पार्टी के महत्वपूर्ण कार्यों में पीडीए की भूमिका बढ़ाकर सपा यह संदेश देना चाहती है कि वही इन समुदायों की असली हितैषी है। राज्यसभा चुनाव में आलोक रंजन की उम्मीदवारी वापस लेकर सपा पहले ही यह संकेत दे चुकी है। विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारी तय करते समय भी पीडीए को प्राथमिकता देने पर काम चल रहा है।
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