अरावली की नई परिभाषा पर SC का फैसला, 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही माना जाएगा अरावली; जानें क्या है Aravalli news
अरावली पर्वत श्रृंखला की नई परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने देश भर में बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के तहत बनी समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। इन सिफारिशों के अनुसार, केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली का हिस्सा माना जाएगा। इस फैसले का उद्देश्य अरावली के संरक्षण और खनन गतिविधियों के बीच संतुलन स्थापित करना है।
अवैध खनन का लंबा इतिहास और SC का दखल
अरावली में दशकों से अवैध खनन एक बड़ी समस्या रही है। खनन माफिया अक्सर स्पष्ट नियमों के अभाव का फायदा उठाते रहे हैं। 1992 में एक्टिविस्ट एमसी मेहता ने दिल्ली में अवैध खनन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। कोर्ट ने 1996 में दिल्ली में अरावली क्षेत्र में अवैध निर्माण पर और 2002 में दिल्ली-एनसीआर में खनन पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। 2009 में अरावली स्थित सभी जिलों में खनन पर पाबंदी लगाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कई बार स्पष्ट फॉर्मूला तय करने के निर्देश दिए।
100 मीटर की ऊंचाई का फॉर्मूला क्यों अपनाया गया?
MoEFCC के तहत गठित समिति ने 100 मीटर की ऊंचाई को ही अरावली का हिस्सा मानने की सिफारिश की थी। यह फॉर्मूला राजस्थान सरकार द्वारा 2003 में खनन नीतियों के लिए भी अपनाया गया था, ताकि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों पर खनन की अनुमति दी जा सके। हालांकि, विवाद लगातार बना रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक संतुलित निर्णय दिया है, जिसका उद्देश्य अरावली के मुख्य हिस्सों का संरक्षण करना और विशेष परिस्थितियों में खनन की स्वीकृतियां देना है।
पहाड़ी की ऊंचाई की परिभाषा
विशेषज्ञों के अनुसार, 100 मीटर की ऊंचाई का मतलब केवल पहाड़ी के शिखर (चोटी) की खड़ी ऊंचाई से नहीं है। इसमें पहाड़ की पूरी संरचना, शिखर से लेकर ढलान खत्म होने तक का सारा हिस्सा शामिल होता है। यह परिभाषा पहाड़ की सभी ढलानों को कवर करती है, चाहे वे सीधी हों या झुकी हुई।
