S Jaishankar ने खुद को बताया हनुमान, कहा- नेतृत्व ही देश की दिशा तय करता है
पुणे साहित्य महोत्सव में ‘डिप्लोमेसी टू डिस्कोर्स’ सत्र के दौरान, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने खुद को भगवान हनुमान के समान बताया और कहा कि देश की दिशा नेतृत्व तय करता है.
एक सवाल का जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा कि सवाल यह नहीं होना चाहिए कि क्या भारत को और जयशंकर चाहिए, बल्कि यह होना चाहिए कि ‘एक मोदी’ हैं. उन्होंने कहा, “हनुमान जी अंततः सेवा करते हैं.” जयशंकर ने जोर देकर कहा कि देश का आकार नेता, उनकी दृष्टि और आत्मविश्वास से बनता है, जबकि अन्य उस जनादेश को लागू करते हैं.
जयशंकर ने कहा कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था गठबंधन की राजनीति जैसी है, जहां गठबंधन लगातार बदलते रहते हैं और कोई एक प्रमुख शक्ति ब्लॉक नहीं है. ऐसे बहुध्रुवीय विश्व में, भारत को राष्ट्रीय हित के आधार पर लचीला रहना होगा. उन्होंने कहा कि भारत को विभिन्न देशों के साथ एक साथ काम करने की क्षमता रखनी चाहिए, न कि कठोर गठबंधनों में बंधे रहना चाहिए.
उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों में भारत के विदेशी संबंधों का प्रबंधन काफी जटिल हो गया है. अमेरिका के साथ निरंतर पुनर्गठन की आवश्यकता है, चीन के साथ संबंध कठिन बने हुए हैं, और यूक्रेन युद्ध के दबाव के बीच रूस को आश्वस्त करना चुनौतीपूर्ण हो गया है. जापान के साथ भी संबंध जटिल हुए हैं, जबकि यूरोप एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में उभरा है.
जयशंकर ने भारत के पड़ोस में संबंधों को ‘असममित’ बताया, जहां छोटे राष्ट्र अक्सर प्रशंसा और आलोचना के बीच झूलते रहते हैं. इसके बावजूद, उन्होंने कहा कि भारत ने लगातार ‘फर्स्ट रिस्पोंडर’ के रूप में काम किया है, चाहे वह श्रीलंका को सहायता हो या कोविड-19 के दौरान टीके की आपूर्ति.
उन्होंने कहा कि भारत को परिवार के मुखिया की तरह व्यवहार करना चाहिए, क्षेत्रीय स्थिरता की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, भले ही मतभेद हों. जयशंकर ने यह भी कहा कि बहुध्रुवीय दुनिया में चुप रहने से हाशिए पर जाने का खतरा है, लेकिन कूटनीति में यह तय करना महत्वपूर्ण है कि कब जोर देना है और कब संयम बरतना है.
