राज्यों को देना होगा पाई-पाई का हिसाब, 2027 तक डिजिटल बनेगा वित्तीय लेखा-जोखा
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) ने राज्यों में वित्तीय पारदर्शिता को बढ़ावा देने और उनके आय-व्यय के तौर-तरीकों में सुधार लाने के लिए दो महत्वपूर्ण कदम उठाने का निर्णय लिया है। अब सभी राज्य सरकारों को अपने आय-व्यय का ब्यौरा पूरी तरह से डिजिटल तरीके से और निर्धारित समय-सीमा में CAG को सौंपना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही, वर्ष 2027-28 से पूरे देश में व्यय के वर्गीकरण के लिए एक समान मानक लागू किया जाएगा।
CAG का मानना है कि इन पहलों से दीर्घकालिक रूप से पूरे देश में आर्थिक समानता बढ़ेगी और सुशासन की गुणवत्ता में सुधार होगा। इससे उन राज्यों को विशेष लाभ हो सकता है जहां खनिज संपदा प्रचुर मात्रा में है, साथ ही यह आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों को केंद्रीय सहायता प्राप्त करने की राह को भी सुगम बना सकता है।
सूत्रों के अनुसार, विभिन्न राज्यों द्वारा खर्च और राजस्व को वर्गीकृत करने के अपने-अपने तरीकों के कारण एक राज्य की वित्तीय स्थिति की दूसरे राज्य या केंद्र से तुलना करना अत्यंत कठिन हो जाता था। इस कमी को दूर करने के लिए, 11 नवंबर 2025 को जारी एक अधिसूचना में सभी 28 राज्यों और विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों को वित्तीय वर्ष 2027-28 से एकसमान ‘ऑब्जेक्ट हेड्स’ (विस्तृत व्यय वर्गीकरण) अपनाने का निर्देश दिया गया है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, पूंजीगत परियोजनाओं आदि पर होने वाले खर्च की सीधी तुलना संभव हो सकेगी।
दूसरी बड़ी व्यवस्था डिजिटल और समयबद्ध लेखा-जमा करने की है। अब सभी राज्य मासिक सिविल अकाउंट्स हर महीने की 10 तारीख तक, और वार्षिक वित्त लेखा एवं विनियोग लेखा 30 सितंबर तक डिजिटल हस्ताक्षर के साथ संबंधित पोर्टल (PFMS-सार्वजनिक वित्त प्रबंधन सिस्टम) पर अपलोड करेंगे। कागजी प्रति भेजने की दशकों पुरानी व्यवस्था समाप्त की जा रही है। इसके अलावा, देरी होने पर राज्य के कंसोलिडेटेड फंड से 50 लाख रुपये प्रति माह तक की कटौती का प्रावधान भी लागू कर दिया गया है, और कुछ राज्यों पर हाल ही में यह आर्थिक दंड लगाया भी जा चुका है।
CAG अधिकारियों का कहना है कि ये दोनों सुधार मिलकर देश के सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन में क्रांति लाएंगे। अगले दो वित्त वर्षों के भीतर देश के सभी राज्यों के कुल व्यय डेटा के 98 प्रतिशत हिस्से का तुलनात्मक अध्ययन होने लगेगा, जिससे राज्यों के बीच आर्थिक व सामाजिक विकास की खाई को तेजी से पाटने में मदद मिलेगी। वर्तमान में, केवल राज्यों द्वारा व्यय की गई कुल राशि के 40-45 प्रतिशत हिस्से का ही तुलनात्मक अध्ययन संभव हो पाता है। सभी राज्यों के व्यय के मुख्य मदों जैसे वेतन, सामग्री सेवाएं, अनुदान, पूंजीगत व्यय को एक समान बनाने से शिक्षा, स्वास्थ्य या बुनियादी ढांचे पर खर्च की तुलना आसान हो जाएगी, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन राज्य अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग कर रहा है। यह केंद्र सरकार को अपने फंड के वितरण को अधिक निष्पक्ष बनाने में भी मदद करेगा।
