सरकारी नौकरी में बेसिक पे और इन-हैंड सैलरी का पूरा गणित समझें | career news
सरकारी नौकरी की वैकेंसी सामने आते ही सबसे पहले जिस बात पर युवाओं का ध्यान जाता है, वह है मिलने वाला वेतन। हालांकि, कई बार नोटिफिकेशन में दी गई बेसिक पे और बैंक खाते में आने वाली रकम को देखकर लोग भ्रमित हो जाते हैं। यह जानकारी होना हर फ्रेशर के लिए जरूरी है ताकि वे अपनी वित्तीय योजना सही ढंग से बना सकें। (career news)
बेसिक पे और भत्तों का गणित
बेसिक पे किसी भी कर्मचारी की मूल सैलरी होती है, जो उसके पद और पे-मैट्रिक्स के आधार पर तय की जाती है। केंद्र सरकार के सातवें वेतन आयोग के नियमों के तहत अलग-अलग पदों के लिए यह मूल राशि अलग होती है। लेकिन यह कर्मचारी की कुल आय नहीं है। इस मूल वेतन के साथ सरकार के नियमों के अनुसार महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता और परिवहन भत्ता जैसे कई लाभ जोड़े जाते हैं, जिससे ग्रॉस सैलरी बनती है।
इन-हैंड सैलरी में क्यों आती है कमी
भत्ते जुड़ने के बाद सैलरी भले ही बढ़ जाती है, लेकिन बैंक खाते में आने वाली शुद्ध रकम यानी इन-हैंड सैलरी अलग होती है। ग्रॉस सैलरी में से नेशनल पेंशन सिस्टम, आयकर और अन्य नियमों के तहत होने वाली कटौतियों को घटाया जाता है। इन सभी कटौतियों के बाद जो अंतिम राशि कर्मचारी के हाथ या बैंक खाते में आती है, उसे ही इन-हैंड सैलरी कहा जाता है। सही वित्तीय प्लानिंग के लिए इस अंतर को समझना हर नौकरीपेशा के लिए आवश्यक है।
