दिल्ली यूनिवर्सिटी चुनाव में निर्दलीय दीपांशु शौकीन की ऐतिहासिक जीत, ABVP और NSUI को पछाड़ा | dusu election news
दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) की छात्र राजनीति में इस साल एक ऐसा उलटफेर देखने को मिला, जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों के होश उड़ा दिए। डीयू छात्र संघ चुनाव के उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरे दीपांशु शौकीन ने शानदार जीत हासिल करते हुए 72 साल पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया। इस मुकाबले में उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) जैसी स्थापित ताकतों को पीछे छोड़ दिया [dusu election news]।
वर्ष 2022 में एक साधारण फ्रेशर्स पार्टी के दौरान दीपांशु द्वारा कही गई बात कि एक दिन पीछे काफिला होगा, आखिरकार सच साबित हुई। पीरागढ़ी के एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले दीपांशु के पिता डीटीसी में बस कंडक्टर और मां आंगनवाड़ी में कार्यरत हैं। बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि और भारी-भरकम फंड के चुनावी मैदान में उतरने के बावजूद उन्होंने अपनी जमीनी पकड़ और छात्रों के बीच बनाई गई मजबूत छवि के दम पर यह मुकाम हासिल किया।
संगठनों की बेरुखी और बगावत
दीपांशु ने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत एनएसयूआई के साथ की थी और संगठन के लिए वर्षों तक ईमानदारी से काम किया। हालांकि, उम्र और वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने हार न मानते हुए निर्दलीय ताल ठोकने का निर्णय लिया। उनके इस फैसले में उनके दोस्तों, पुराने समर्थकों और आम छात्रों का भरपूर साथ मिला। सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता और छात्रों के मुद्दों पर लगातार मुखर रहने की शैली ने उन्हें युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया।
पारंपरिक राजनीति पर आम छात्र की जीत
डीयू के चुनावों में अक्सर धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे माहौल में एक साधारण परिवार के युवक की जीत ने यह साबित कर दिया कि यदि छात्र नेता का जुड़ाव सीधे आम छात्रों से हो, तो बड़े संगठनों के समीकरण भी फेल हो सकते हैं। इस अप्रत्याशित परिणाम ने भविष्य की छात्र राजनीति की दिशा और दशा दोनों पर गहरा प्रभाव डाला है, जिससे आने वाले समय में राजनीतिक दलों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करना होगा।
