मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र को दिया सुझाव, बच्चों के लिए ‘Social Media Ban’ पर बने कानून
मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर कानून बनाने की संभावना तलाशने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने यह टिप्पणी बाल पोर्नोग्राफी सामग्री की आसान उपलब्धता और बच्चों पर इसके नकारात्मक प्रभाव से संबंधित एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
कोर्ट ने कहा कि जब तक ऐसा कानून लागू नहीं होता, तब तक संबंधित अधिकारियों को जागरूकता अभियान को और अधिक प्रभावी ढंग से तेज करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह संदेश सभी उपलब्ध माध्यमों से संवेदनशील समूह तक पहुंचाया जाना चाहिए।
ऑस्ट्रेलियाई कानून का संदर्भ
हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर विचार किया, जिसमें ऑस्ट्रेलिया के हालिया कानून का उल्लेख किया गया था। ऑस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर को 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला दुनिया का पहला देश बनकर उभरा। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि भारत सरकार को भी इसी तरह का कानून पारित करना चाहिए। याचिका में कहा गया कि जागरूकता और डिवाइस पर ‘पैरेंटल विंडो’ जैसे नियंत्रण बाल पोर्नोग्राफी जैसी बुराई को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं।
जागरूकता अभियानों पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और तमिलनाडु बाल अधिकार संरक्षण आयोग की वैधानिक जिम्मेदारी पर ध्यान दिया। कोर्ट ने कहा कि इन आयोगों का कर्तव्य है कि वे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच बाल अधिकारों की साक्षरता फैलाएं और सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूकता बढ़ाएं। कोर्ट ने पाया कि स्कूलों में बच्चों पर ध्यान केंद्रित करने वाले कुछ जागरूकता अभियान चल रहे हैं, लेकिन ये अभियान पर्याप्त नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) वाले यूआरएल सक्रिय हैं। हालांकि, उपयोगकर्ता के स्तर पर भी नियंत्रण होना चाहिए, जो केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है जब डिवाइस पर पैरेंटल कंट्रोल ऐप उपलब्ध हो। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए अंतिम उपयोगकर्ताओं को बाल पोर्नोग्राफी के खतरे और इसे रोकने के उपायों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
