केन टाइगर शिकार भूले, अब ताउम्र चिड़ियाघर में रहेंगे: जानें वजह
कानपुर चिड़ियाघर में लाए गए 10 केन टाइगर अब जंगल में शिकार करने के काबिल नहीं रहे और उन्हें ताउम्र चिड़ियाघर में ही रहना पड़ेगा। ये बाघ अलग-अलग समय में पीलीभीत, खीरी और सीतापुर जैसे जिलों से रेस्क्यू कर लाए गए थे। कोरोना काल में जंगल से निकलकर गन्ने के खेतों में पहुंचे इन बाघों को ‘केन टाइगर’ कहा गया। चिड़ियाघर में सहज भोजन मिलने के कारण ये आलसी हो गए और शिकार करने की फुर्ती व हुनर खो बैठे।
चिड़ियाघर के चिकित्सकों के अनुसार, कोई भी बाघ 15 दिन से अधिक चिड़ियाघर में रहने पर जंगल में शिकार करने के अपने नैसर्गिक हुनर को भूल जाता है। ऐसे में, इन बाघों को जंगल में छोड़ना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि वे इंसानों या पालतू मवेशियों का शिकार कर सकते हैं।
कानपुर चिड़ियाघर में लाए गए बाघों में बघीरा, नरसिंहा और आद्या जैसे नाम शामिल हैं। बघीरा को ढाई साल की उम्र में बरेली के पास एक रबड़ फैक्ट्री से रेस्क्यू किया गया था। नरसिंहा को सीतापुर से लाया गया, जो 11 फीट लंबा है। आद्या नामक बाघिन को पीलीभीत से लाया गया था। वर्तमान में चिड़ियाघर में नौ केन टाइगर हैं, जिनमें से एक को दक्षिण भारत के प्राणी उद्यान में भेज दिया गया है।
चिड़ियाघर निदेशक डॉ. कन्हैया पटेल ने बताया कि रेस्क्यू किए गए बाघ 15 दिन बाद ही शिकार का हुनर खो देते हैं। यदि इन्हें जंगल में छोड़ा भी जाए, तो वे इंसानी बस्तियों की ओर भोजन की तलाश में चले जाएंगे। यही कारण है कि अब ये बाघ अपना शेष जीवन चिड़ियाघर में ही बिताएंगे। इन बाघों को चिड़ियाघर में रखना आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, क्योंकि ये अब जंगली वातावरण के लिए अनुपयुक्त हो गए हैं।
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