Jnanpith Award विजेता Vinod Kumar Shukla का निधन, 89 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस
महान हिंदी साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उन्होंने रायपुर के एम्स अस्पताल में उम्र संबंधी बीमारियों के चलते अंतिम सांस ली। शुक्ल के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उन्हें 2025 में देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
विनोद कुमार शुक्ल का जन्म 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में हुआ था। अपने दशकों लंबे करियर में, उन्होंने आधुनिक हिंदी लेखन में एक अनूठी पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में सादगी के साथ-साथ गहन दार्शनिक समझ का मिश्रण देखने को मिलता है। शुक्ल ने कविता, उपन्यास और लघु कथाओं सहित विभिन्न विधाओं में काम किया, और उनकी कृतियों में अक्सर जादुई यथार्थवाद (magic realism) का पुट होता था।
उनकी कहानी कहने की शैली रोजमर्रा की घटनाओं पर आधारित थी, लेकिन इसमें एक दार्शनिक और अस्तित्वगत गूंज थी जो साधारण को भी असाधारण बना देती थी। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘नौकर की कमीज’ (1979) शामिल है, जिस पर प्रसिद्ध निर्देशक मणि कौल ने फिल्म भी बनाई थी।
शुक्ल को 1999 में उनके उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। 2025 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने से उन्हें देश के शीर्ष साहित्यकारों में स्थान मिला। वह छत्तीसगढ़ से यह सम्मान पाने वाले पहले लेखक थे।
उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में कविता संग्रह ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ (1992) और ‘खिलेगा तो देखेंगे’ शामिल हैं। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है, जिससे उनकी उपस्थिति हिंदी भाषी क्षेत्र से परे भी महसूस की जाती है। हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नवंबर की शुरुआत में उनसे फोन पर बात कर उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली थी।
