आगरा शिखर वार्ता में क्यों विफल हुई थी परवेज मुशर्रफ की भारत यात्रा और दाऊद इब्राहिम का कनेक्शन | international news
पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ के निधन के साथ ही दक्षिण एशिया की कूटनीति के कई पुराने पन्ने फिर से खुल गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख प्रसंग जुलाई 2001 की वह बहुचर्चित आगरा शिखर वार्ता है, जो दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने के बजाय कड़वाहट और बढ़ा गई थी। इस वार्ता की पृष्ठभूमि करगिल युद्ध के तुरंत बाद तैयार हुई थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने क्षेत्रीय शांति की पहल करते हुए जनरल मुशर्रफ को भारत आमंत्रित किया था।
वार्ता की शुरुआत में माहौल भले ही कूटनीतिक औपचारिकताओं से बंधा था, लेकिन अंदरखाने तनाव गहराता जा रहा था। तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने जब मुशर्रफ से तुर्की की तर्ज पर प्रत्यर्पण संधि करने की बात कही, तो कूटनीतिक मंच पर अचानक गर्माहट आ गई। जैसे ही आडवाणी ने 1993 के मुंबई बम धमाकों के मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम को भारत को सौंपने की शर्त रखी, वैसे ही परवेज मुशर्रफ का रुख पूरी तरह बदल गया। दाऊद के पाकिस्तान में होने से इंकार करने के बाद से ही वार्ता पटरी से उतरने लगी थी।
इस ऐतिहासिक कूटनीतिक असफलता का असर क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीति पर लंबे समय तक देखने को मिला। मुशर्रफ अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ आगरा तो पहुंचे, लेकिन शिमला और लाहौर समझौतों का हवाला देने तथा सीमा पार आतंकवाद पर लगाम लगाने से साफ इंकार कर दिया। इसके विपरीत, उन्होंने कश्मीर के मुद्दे को बातचीत के केंद्र में लाने की जिद पकड़ ली, जिसके चलते बिना किसी ठोस नतीजे के वार्ता विफल हो गई और दोनों देशों के संबंध लंबे समय के लिए शीत युद्ध जैसे दौर में चले गए।
