खाने के तेल की कीमतों में भारी उछाल, रसोई का बजट बिगड़ने की आशंका; ये है बड़ी वजह!
खाने का तेल जल्द ही आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है। क्योंकि, डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता रुपया किचन का बजट बिगाड़ने वाला है। भारत अपनी जरूरत का करीब 60% खाद्य तेल बाहर से खरीदता है, ऐसे में रुपए की गिरावट सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ने वाला है।
पिछले छह महीनों में रुपए में करीब 6% की गिरावट दर्ज की गई है और यह अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। रुपए की कमजोरी का मतलब है कि आयात महंगा हो जाता है, यानी बाहर से आने वाला हर सामान, खासकर खाद्य तेल, ज्यादा कीमत पर मिलेगा। पिछले साल भारत ने करीब 160 लाख टन खाद्य तेल आयात किया था, जिसकी कीमत लगभग 1.60 लाख करोड़ रुपए रही। अब जब इंटरनेशनल मार्केट में भी तेलों के दाम बढ़ रहे हैं, तो घरेलू बाजार में महंगाई लगभग तय मानी जा रही है। फिलहाल रिफाइंड और कच्चे तेल दोनों की कीमतों में तेजी बनी हुई है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर रुपया ऐसे ही कमजोर होता रहा, तो आने वाले हफ्तों में सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। इसका असर सिर्फ किचन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कुल महंगाई पर भी दबाव बढ़ेगा।
शुक्रवार, 12 दिसंबर को ट्रेडिंग की शुरुआत में रुपया डॉलर के मुकाबले 90.56 तक लुढ़क गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कल डिफेंस और इंटरेस्ट पेमेंट के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर खरीदे गए थे। आज तेल कंपनियों की डिमांड के चलते दबाव बढ़ा। हालांकि न्यूयॉर्क सत्र में मोदी-ट्रंप वार्ता के बाद रुपया थोड़ा मजबूत होकर 90.15 प्रति डॉलर तक पहुंचा, लेकिन बाजार में अस्थिर में अस्थिरता अभी भी बनी हुई है।
डीलर्स की मानें तो ट्रेड डील पर कोई पॉजिटिव संकेत न मिलने से भारतीय ट्रेडर्स निराश हैं। कम लिक्विडिटी और छोटे ट्रेडर्स की एक्टिविटी भी रुपए पर दबाव बढ़ा रही है। उनका कहना है कि सुबह बाजार में RBI ही नहीं, बल्कि प्राइवेट प्लेयर्स की ओर से भी डॉलर बेचे गए, जिसकी वजह से थोड़ी राहत दिखी।
हालांकि, साफ शब्दों में कहें तो किचन के लिए बुरा वक्त आने की आशंका है। रुपए की कमजोरी और इंटरनेशनल महंगाई, दोनों मिलकर खाने का तेल महंगा कर सकते हैं।
