घर की जहरीली हवा: आपके फेफड़ों के लिए खतरा, सीओपीडी से बचाव के लिए सावधानियां
सीओपीडी, फेफड़ों से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है, जिसके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल वर्ल्ड सीओपीडी डे मनाया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि घर के अंदर की हवा भी आपके फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है।nnसूत्रों के अनुसार, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग में पल्मोनोलॉजी के सीनियर डायरेक्टर डॉ. इंदर मोहन चुघ ने बताया कि भारत में लाखों लोगों के लिए सबसे खतरनाक हवा वही है जिसमें वे अपने घरों के अंदर सांस लेते हैं।nnडॉक्टर ने आगे बताया कि घर के अंदर का वायु प्रदूषण जैसे खाना पकाने का धुआं, अगरबत्तियों का इस्तेमाल, मच्छर भगाने वाली कॉइल, रूम फ्रेशनर और खराब वेंटिलेशन से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) का खतरा बढ़ता है। उन्होंने बताया कि इस बीमारी के इन कारणों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।nnविशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण और छोटे शहरों में लकड़ी, कोयला, पराली या गोबर से बने पारंपरिक चूल्हों का इस्तेमाल लगभग रोजाना खाना पकाने के लिए किया जाता है। ये फ्यूल बेहद छोटे कण और जहरीली गैसें छोड़ते हैं, जो सीधे तौर पर एयरवेज में जलन और डैमेज का कारण बनते हैं।nnलंबे समय तक बार-बार इसके संपर्क में आने से पुरानी खांसी, कफ, सांस लेने में तकलीफ और अंततः सीओपीडी हो सकता है। यह समस्या उन लोगों में भी हो सकती है जिन्होंने कभी धूम्रपान तक नहीं किया है। खराब वेंटिलेशन वाली रसोई में खाना पकाने वाली महिलाएं और आस-पास खेलने वाले छोटे बच्चे अक्सर घर के अंदर मौजूद हानिकारक धुएं के अनजाने में ही शिकार बन जाते हैं।nnडॉक्टर ने बताया कि सिर्फ चूल्हे का धुआं ही नहीं, अगरबत्ती, धूप, मच्छर भगाने वाली कॉइल, सेंटेड मोमबत्तियां और केमिकल बेस्ड रूम फ्रेशनर भी घर के अंदर की हवा की गुणवत्ता को खराब कर सकते हैं। पुराने गद्दों, कालीनों और गीली दीवारों से निकलने वाले कण, साथ ही फफूंद और पालतू जानवरों के बाल भी सेंसिटिव फेफड़ों को और ज्यादा खराब कर सकते हैं। अस्थमा या शुरुआती सीओपीडी से जूझ रहे व्यक्ति के लिए, ऐसी चीजों के इस्तेमाल से दौरे और भी ज्यादा पड़ सकते हैं, सांस लेने में तकलीफ बढ़ सकती है और अस्पताल के चक्कर भी बढ़ सकते हैं।nnबचाव के लिए, डॉक्टर ने सुझाव दिया कि रसोई में बेहतर वेंटिलेशन, एग्जॉस्ट फैन या चिमनी का इस्तेमाल, हेल्दी फ्यूल (लिक्विड प्रोपेन गैस या इंडक्शन) का इस्तेमाल और कॉइल और तेज एरोसोल का इस्तेमाल न करना, घर के अंदर के प्रदूषण को कम करने में मदद कर सकता है।nnधूल कम करने के लिए नियमित सफाई, जहां तक हो सके खिड़कियां खुली रखना और धुएं वाले हिस्से में खाना बनाते समय मास्क पहनना, ये सभी सरल लेकिन प्रभावी कदम हैं। सीओपीडी को अक्सर “स्मोकिंग करने वालों की बीमारी” कहा जाता है, लेकिन कई भारतीय महिलाओं और स्मोक न करने वालों के लिए यह समस्या घर से ही शुरू होती है- घर की खराब हवा से। घर के अंदर के वायु प्रदूषण को एक गंभीर रिस्क फैक्टर के रूप में पहचानना, उन लोगों के फेफड़ों की सुरक्षा की दिशा में पहला कदम है, जो हर दिन चुपचाप इसके संपर्क में आते हैं।
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