डिजिटल अरेस्ट का डर: 20 महीने में 35वीं ठगी, फिर भी लोग सतर्क नहीं
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीते 20 महीनों में 35 से अधिक मामले सामने आए हैं, जिनमें जालसाजों ने लोगों को डराकर करोड़ों रुपये ठग लिए हैं। हाल ही में, एफसीआई के एक रिटायर्ड अधिकारी को 18 दिन तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखकर 42.09 लाख रुपये की ठगी की गई। यह घटना दर्शाती है कि सरकारी एजेंसियों का डर दिखाकर साइबर अपराधी किस हद तक लोगों को लूट रहे हैं।
लखनऊ में वर्ष 2025 के 12 महीनों में 24 लोग इस तरह की ठगी का शिकार हुए, जबकि इस साल जनवरी से अब तक 14 लोग जालसाजों के झांसे में आ चुके हैं। इससे पहले, 16 से 22 जुलाई के बीच एयरपोर्ट के पूर्व निदेशक और उनकी पत्नी से 70 लाख रुपये ठगे गए थे। 16 मार्च को पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष विजय बहादुर यादव को भी एडिटेड फोटो दिखाकर डिजिटल अरेस्ट की कोशिश की गई थी।
जागरूकता की कमी चिंताजनक है। दूरसंचार कंपनियों ने कॉलर ट्यून के माध्यम से लोगों को सचेत किया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में भी इस बारे में आगाह किया, और पुलिस-प्रशासन लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। इसके बावजूद, लोग जालसाजों के फोन कॉल से घबराकर पैसे ट्रांसफर कर रहे हैं। अपर पुलिस उपायुक्त अपराध किरन यादव का कहना है कि कोई भी एजेंसी या पुलिस डिजिटल अरेस्ट नहीं करती है। ऐसे मामलों में सजगता ही बचाव है। उन्होंने सलाह दी कि बैंक खाते से जुड़ा ओटीपी या एटीएम की जानकारी किसी अजनबी से साझा न करें।
साइबर क्राइम सेल के इंस्पेक्टर अमर सिंह के अनुसार, ठगी का शिकार होने पर तुरंत हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं। उन्होंने यह भी बताया कि सीबीआई, ईडी, कस्टम या पुलिस वीडियो कॉल पर गिरफ्तार नहीं करते। ऐसी कॉल आने पर घबराएं नहीं, परिजनों से बात करें, और अपनी व्यक्तिगत जानकारी साझा न करें। कॉल करने वाले की पहचान पूछें और अगर शक हो तो सीधे स्थानीय पुलिस स्टेशन पर कॉल करके पुष्टि करें।
