अयोध्या में सावन का उल्लास: मणिपर्वत से शुरू होता है राम-सीता का झूलनोत्सव
अयोध्या में सावन का महीना आते ही वातावरण भक्ति और उल्लास से सराबोर हो जाता है। इस दौरान, मणिपर्वत वह महत्वपूर्ण स्थान है जहाँ से हर साल झूलनोत्सव की विधिवत शुरुआत होती है। सावन शुक्ल तृतीया की सुबह भगवान श्रीसीताराम के झूलन विहार के साथ यह विश्वप्रसिद्ध उत्सव आरंभ होता है, जो पूरे शहर को एक नई सांस्कृतिक धड़कन देता है। मणिपर्वत इस समय सिर्फ एक प्राचीन टीला नहीं, बल्कि पूरे शहर की श्रद्धा का केंद्र बन जाता है।
विभिन्न प्रमुख मंदिरों जैसे कनक भवन, दशरथ राजमहल, मणिराम छावनी और रामवल्लभा कुंज से भगवान की प्रतिमाएं पालकियों और शोभायात्राओं में निकलती हैं। इन यात्राओं में श्रद्धालु फूल बरसाते हैं, शंखनाद और वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ भजन-कीर्तन की टोलियां चलती हैं। मणिपर्वत पर भगवान को विधिवत झूला झुलाने के बाद ही अयोध्या के झूलनोत्सव की आधिकारिक शुरुआत मानी जाती है। इसके बाद विग्रह अपने मंदिरों में लौटते हैं और रक्षाबंधन तक झूलों पर विराजमान रहते हैं। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में यह उत्सव नागपंचमी से शुरू होता है, जो इसकी विशिष्ट परंपरा को दर्शाता है।
मणिपर्वत के महत्व से जुड़ी दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, यह भगवान राम और माता सीता का विहार स्थल था, जहाँ वे सावन ऋतु में प्रकृति के बीच विचरण करते थे। वर्तमान झूलन परंपरा इसी दिव्य स्मृति का सांस्कृतिक विस्तार मानी जाती है। दूसरी लोककथा भी उतनी ही रोचक है, जो इस परंपरा के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है।
मणिपर्वत से शुरू होने वाली यह झूलन परंपरा अयोध्या के विभिन्न मंदिरों में अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। रंगमहल (रामकोट) में लगभग 300 साल पुरानी परंपरा के तहत भगवान चांदी जड़ित काष्ठ के झूले पर विराजते हैं, जहाँ कथक नृत्य और भजन गायन का कार्यक्रम होता है। यहाँ फूल बंगला और गलबहियां की झांकियां विशेष आकर्षण का केंद्र होती हैं। मान्यता है कि यह स्थान कभी भगवान श्रीराम के कुलदेवता भगवान रंगनाथ का था और माता कौशल्या ने इसे सीता माता को मुंह दिखाई में दिया था।
गोलाघाट स्थित सद्गुरु सदन में झूलनोत्सव गुरु पूर्णिमा से भाद्रपद कृष्ण तृतीया तक चलता है। यहाँ हर रोज झूलन झांकी सजाई जाती है और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। उत्सव के अंतिम दिन ब्रह्ममुहूर्त में लक्ष्मण किलाधीश के पदगायन के साथ भगवान को भावभीनी विदाई दी जाती है। जानकी बाग (चक्रतीर्थ) में एक दिवसीय आयोजन के साथ इस उत्सव श्रृंखला का औपचारिक समापन होता है, जो अगले वर्ष फिर मिलने का वादा छोड़ जाता है।
झूलनोत्सव के साथ-साथ अयोध्या में सावन माह में कांवड़ यात्रा का भी उफान रहता है। शिवभक्त सरयू से जल भरकर नागेश्वरनाथ महादेव सहित विभिन्न शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। हर सोमवार को इन मंदिरों में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है और ‘बोल बम’ के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है। यह दृश्य अयोध्या की धार्मिक और सांस्कृतिक जीवंतता का प्रमाण है।
