मुजफ्फरपुर SKMCH में ‘ट्रामा सेंटर’ का बोर्ड, इलाज कैंसर का; Bihar Health News
उत्तर बिहार के सबसे बड़े अस्पताल श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज हास्पिटल (एसकेएमसीएच) में ट्रामा सेंटर की सुविधा केवल बोर्ड तक ही सिमट कर रह गई है। गंभीर रूप से घायल मरीजों को उच्च स्तरीय इलाज देने के लिए बना यह सवा सौ करोड़ रुपये का ट्रामा सेंटर फिलहाल टाटा मेमोरियल सेंटर के कैंसर अस्पताल के अधीन है। इस कारण सड़क हादसों में घायल होने वाले मरीजों को समय पर सही उपचार नहीं मिल पा रहा है।
नेशनल हाइवे किनारे स्थित होने के कारण एसकेएमसीएच में प्रतिदिन औसतन बीस से अधिक मरीज सड़क हादसों के शिकार होकर पहुंचते हैं। नियमतः इन्हें ट्रामा सेंटर में विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में रखा जाना चाहिए, लेकिन वहां कैंसर विभाग का ओपीडी और ओटी संचालित होने के कारण घायलों को जनरल सर्जरी वार्ड या इमरजेंसी के भरोसे छोड़ दिया जाता है। संसाधनों के अभाव में गंभीर मरीजों को अक्सर पटना रेफर कर दिया जाता है, जिससे रास्ते में ही कई दम तोड़ देते हैं।
अस्पताल प्रशासन ने अस्थायी व्यवस्था के तहत टाटा कैंसर संस्थान को यह जगह दी थी, लेकिन यह अब स्थायी हो गया है। कैंसर के मरीजों को सुविधा मिलना सुखद है, लेकिन इसके लिए ट्रामा सेंटर की बलि चढ़ाना हजारों घायलों की जान से भी खिलवाड़ हो रहा है। अस्पताल परिसर में मौजूद मरीज के स्वजन का कहना है कि ट्रामा सेंटर के बाहर बोर्ड तो लगा है, लेकिन अंदर जाने पर पता चलता है कि वहां कैंसर का इलाज हो रहा है। हड्डी टूटने या सिर में गंभीर चोट लगने पर मरीजों को घंटों स्ट्रेचर पर इंतजार करना पड़ता है।
आंकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल 2022 से मई 2025 तक मुजफ्फरपुर में विभिन्न सड़क हादसों में 929 लोगों की मौत हुई है। मुजफ्फरपुर के अलावा सीतामढ़ी, शिवहर और मोतिहारी के मरीज भी एसकेएमसीएच रेफर होकर पहुंचते हैं। ऐसे में ट्रामा सेंटर का पूर्ण रूप से कार्य न करना मरीजों के लिए बड़ी चुनौती है।
चिकित्सकों के अनुसार, एक ट्रामा सेंटर में 24 घंटे जनरल सर्जन, हड्डी रोग विशेषज्ञ, न्यूरोसर्जन और एनेस्थेटिस्ट की मौजूदगी होनी चाहिए। साथ ही आधुनिक डायग्नोस्टिक सेवाएं जैसे सीटी स्कैन, एमआरआई और आपातकालीन ऑपरेशन थिएटर की व्यवस्था भी जरूरी है। वर्तमान में ट्रामा सेंटर के भवन का उपयोग कैंसर संस्थान द्वारा किए जाने के कारण ये सुविधाएं बाधित हैं।
