7 पूर्व अध्यक्षों के साथ BJP, जानें किन दलों में अभी भी पुराने चीफ सक्रिय
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नए अध्यक्ष नितिन नवीन के पदभार ग्रहण के साथ ही पार्टी के सक्रिय और जीवित पूर्व अध्यक्षों की संख्या सात हो गई है। इनमें लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं, जिनकी उम्र 90 वर्ष से अधिक है और राजनीतिक सक्रियता सीमित है। वहीं, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अमित शाह और जेपी नड्डा जैसे चार पूर्व अध्यक्ष न केवल पूरी तरह सक्रिय हैं, बल्कि वर्तमान सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भाजपा के चार पूर्व अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण और जना कृष्णमूर्ति अब हमारे बीच नहीं हैं।
सदस्य संख्या के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के अलावा, भारत में कई राष्ट्रीय, प्रांतीय और छोटे दल मौजूद हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार, वर्तमान में 6 राष्ट्रीय दल, 33 प्रांतीय दल और 2049 गैर-मान्यता प्राप्त दल पंजीकृत हैं। हालांकि, यह एक दिलचस्प तथ्य है कि भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर, कई राष्ट्रीय और प्रांतीय दलों में अध्यक्ष या पार्टी प्रमुख का पद अक्सर नहीं बदलता है। चुनाव केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाते हैं, जो नेता के पार्टी पर एकाधिकार को दर्शाते हैं।
कांग्रेस, भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, जिसके दो पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी सक्रिय हैं। वर्तमान में मल्लिकार्जुन खरगे पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। जनता दल (यूनाइटेड) के पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह और आरसीपी सिंह भी सक्रिय हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के पास पूर्व महासचिव प्रकाश करात हैं, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के महासचिव डी राजा हैं।
पारिवारिक राजनीति की वकालत करने वाले जीतनराम मांझी की हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के पास भी एक पूर्व अध्यक्ष हैं, क्योंकि वर्तमान में उनके बेटे संतोष सुमन पार्टी प्रमुख हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी हैं। बिहार की राजनीति में कई परिवारवादी पार्टियां हावी हैं। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव पिछले 28 वर्षों से इस पद पर बने हुए हैं। दिवंगत रामविलास पासवान भी अपनी पार्टी के आजीवन अध्यक्ष रहे, जिसके बाद उनके भाई पशुपति पारस और बेटे चिराग पासवान ने अलग-अलग पार्टियों का गठन कर स्वयं अध्यक्ष पद संभाला है।
समाजवादी नेता उपेंद्र कुशवाहा ने भी लंबे समय तक वंशवादी राजनीति से दूरी बनाए रखी, लेकिन हाल के विधानसभा चुनावों में वे भी परिवारवाद की ओर बढ़े। उन्होंने कई दल बनाए और हर बार स्वयं अध्यक्ष बने। उनकी वर्तमान पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के विधायक भी अब बागी तेवर दिखा रहे हैं।
भाजपा और कांग्रेस के अलावा, बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की अध्यक्ष मायावती पिछले 22 वर्षों से काबिज हैं। आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल भी पार्टी बनने के समय से इस पद पर हैं। सीपीआई के नेता डी राजा 6 वर्षों से महासचिव हैं। नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के अध्यक्ष कॉनराड संगमा को इस पद पर मार्च में 10 साल पूरे हो जाएंगे।
ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ममता बनर्जी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार भी अपने-अपने दलों के प्रमुख बने हुए हैं। पवार की पार्टी पर अजित पवार के कब्जे के बाद, उन्होंने एक नई पार्टी एनसीपी-शरद पवार का गठन कर लिया है। टीएमसी और एनसीपी सहित कई मान्यता प्राप्त प्रांतीय दलों के प्रमुख पदों पर या तो वही नेता बने हुए हैं या उनके निधन के बाद परिवार के सदस्यों ने बागडोर संभाली है।
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