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बांकेबिहारी मंदिर में सदियों पुरानी देहरी पूजन परंपरा पर लगी रोक, सेवायतों ने जताया कड़ा विरोध

By Nov 23, 2025

वृंदावन स्थित प्रसिद्ध ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में शनिवार को एक ऐसा वाकया हुआ जिसने दशकों पुरानी परंपरा को तोड़ दिया। उच्चाधिकार प्रबंधन समिति द्वारा जगमोहन (गर्भगृह चबूतरा) में प्रवेश और उस पर चढ़ने पर रोक लगाए जाने के कारण पहली बार मंदिर में देहरी पूजन का अनुष्ठान नहीं हो सका। इस निर्णय से मंदिर के सेवायतों में गहरा रोष व्याप्त है और उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया है।

मंदिर प्रबंधन समिति के चार में से दो सेवायत भी इस निर्णय के विरोध में खड़े नजर आए। सेवायतों का तर्क है कि प्रबंधन समिति का मुख्य कार्य मंदिर की व्यवस्थाओं को सुचारू बनाना है, न कि देहरी पूजन जैसी सदियों पुरानी और महत्वपूर्ण परंपराओं को बाधित करना। उनका कहना है कि यह निर्णय धार्मिक कार्यकलापों में अनावश्यक हस्तक्षेप है और मंदिर की मूल सेवा पद्धति के साथ छेड़छाड़ है।

सूचना के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्रबंधन समिति ने भीड़ नियंत्रण के उद्देश्य से यह निर्णय लिया था। गुरुवार रात को ही जगमोहन के आसपास बैरिकेडिंग कर दी गई और गेट बंद कर उस पर चढ़ने पर रोक लगा दी गई। शनिवार सुबह जब सेवायत यजमानों को लेकर पूजन के लिए पहुंचे, तो उन्हें रोक दिया गया। विरोध प्रदर्शन के बाद, सेवायत मथुरा जिलाधिकारी से मिले और अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने जिलाधिकारी से आग्रह किया कि इस व्यवस्था को ठीक किया जाए, अन्यथा वे कानूनी शरण लेने को मजबूर होंगे।

सेवायतों ने आशंका जताई है कि यदि जल्द ही व्यवस्था बहाल नहीं हुई तो देहरी पूजन की यह परंपरा शायद दोबारा शुरू न हो पाए। एक वरिष्ठ सेवायत ने कहा कि वे किसी भी उचित व्यवस्था का समर्थन करते हैं, लेकिन यह निर्णय उनके अधिकारों का हनन करने वाला प्रतीत होता है। समिति के एक सदस्य ने कहा कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन मिलें, और वीआईपी कटघरे का आकार बढ़ाने के साथ-साथ पर्ची सुविधा भी बहाल की जानी चाहिए ताकि भीड़ को संतुलित किया जा सके।

शनिवार को मंदिर में भीड़ के कारण धक्का-मुक्की की भी स्थिति बनी। जिलाधिकारी ने सेवायतों को आश्वासन दिया है कि उनके साथ कोई अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और प्रबंधन समिति के निर्णयों पर भी ध्यान दिया जाएगा, ताकि सेवायतों का भी अहित न हो।

सेवायतों के अनुसार, देहरी पूजन की परंपरा मंदिर के निर्माण के साथ ही, लगभग 1864 से चली आ रही है। पहले यह पूजन सेवायत परिवारों की वृद्ध महिलाएं करती थीं, और बाद में यजमान भी इसमें शामिल होने लगे। इस परंपरा को कई वरिष्ठ सेवायतों ने आगे बढ़ाया है।

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