जन्मजात मूक-बधिर बच्चों को काक्लियर इम्प्लांट से मिलेगी सुनने और बोलने की क्षमता
जन्म से मूक-बधिर बच्चों को सुनने और बोलने की क्षमता प्रदान करने वाली काक्लियर इम्प्लांट तकनीक अब उम्मीद की किरण बनकर उभरी है। गुरुवार को एसएन मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभाग द्वारा आयोजित कार्यशाला में इस महत्वपूर्ण तकनीक पर विस्तार से चर्चा की गई। इस अवसर पर दिल्ली से पधारे पद्मश्री डॉ. जेएम हंस, जिन्होंने 3,500 से अधिक काक्लियर इम्प्लांट किए हैं, मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
डॉ. हंस ने बताया कि भारत में जन्मजात मूक-बधिर बच्चों की संख्या चिंताजनक रूप से अधिक है। इसके पीछे एक प्रमुख कारण कई समुदायों में नजदीकी रिश्तेदारों के बीच होने वाली शादियां हैं, जिससे आनुवंशिक कारणों से शिशु के मूक-बधिर होने की आशंका बढ़ जाती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि छह महीने की आयु में भी काक्लियर इम्प्लांट किया जा सकता है, जिससे बच्चा शीघ्र ही सुनकर बोलना सीख सकता है। हालांकि, अक्सर दो से तीन वर्ष की आयु तक मूक-बधिर होने का पता चल पाता है।
तकनीक में हुए विकास का उल्लेख करते हुए डॉ. हंस ने बताया कि पारंपरिक इम्प्लांट के लिए कान के पीछे एक बड़ा चीरा लगाना पड़ता था, लेकिन अब अत्याधुनिक तकनीक में मात्र 1.4 मिलीमीटर के छेद से टनल बनाकर इम्प्लांट किया जा सकता है। इसके बाद विशेष स्पीच थेरेपी के माध्यम से बच्चे बोलना और सुनना शुरू कर देते हैं। यह तकनीक उन मरीजों के लिए भी वरदान है जिनकी काक्लिया की हेयर सेल्स क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज की विभागाध्यक्ष डॉ. रितु गुप्ता ने बताया कि कॉलेज में भी काक्लियर इम्प्लांट की सुविधा शुरू करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस दिशा में काक्लियर इम्प्लांट के प्रशिक्षण के लिए एक टेम्पोरल बोन डिसेक्शन लैब की स्थापना भी की गई है। प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने चिंता व्यक्त की कि प्रदेश के राजकीय मेडिकल कालेजों में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। निजी अस्पतालों में काक्लियर इम्प्लांट का खर्च 10 लाख रुपये तक आ सकता है, जो अधिकांश परिवारों के लिए वहन करना मुश्किल है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि सरकार इस सुविधा को उपलब्ध कराए तो एसएन मेडिकल कॉलेज में जरूरतमंद मरीजों का निशुल्क इम्प्लांट संभव हो सकेगा। इस दौरान डॉ. धर्मेंद्र कुमार, डॉ. सलोनी सिंह, डॉ. अखिल प्रताप सिंह सहित अन्य विशेषज्ञ भी मौजूद रहे।
