एक समय जब कश्मीर मुद्दे के समाधान के करीब थे भारत और पाकिस्तान | international relations history
साल 2001 का दौर कूटनीति के लिहाज से दक्षिण एशिया में एक अहम मोड़ साबित हो सकता था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बीच कश्मीर मसले के स्थायी समाधान पर गंभीर चर्चा हुई थी। गुजरात भूकंप के बाद उपजे मानवीय सहयोग के माहौल से दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ पिघली और इसी का परिणाम आगरा शिखर सम्मेलन के रूप में सामने आया।
आगरा वार्ता के चार अहम बिंदु
मुशर्रफ द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव में नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने, दोनों तरफ के नागरिकों के लिए आवाजाही सुगम करने, क्षेत्र में सैनिकों की संख्या घटाने और संयुक्त निगरानी तंत्र विकसित करने जैसे प्रावधान शामिल थे। कूटनीतिक गलियारों में यह माना गया कि इन प्रस्तावों से क्षेत्र में शांति का मार्ग प्रशस्त हो सकता था और इससे दोनों देशों के बीच दशकों पुराने तनाव को कम करने में मदद मिलती।
वार्ता के विफल होने के कारण
इस संभावित समझौते के करीब पहुंचने के बावजूद बात आखिरी पलों में बिगड़ गई। करगिल युद्ध के तुरंत बाद का दौर होने के कारण भारतीय नेतृत्व मुशर्रफ की नीयत और उनकी सरकार की स्थिरता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। इसके अलावा घरेलू राजनीतिक दबाव और कठोर वैचारिक असहमतियों ने भी इस शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ने से रोक दिया, जिससे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति एक अलग दिशा में मुड़ गई।
