फ्रांस के छात्र प्रदर्शनों के पीछे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, भारत अगला निशाना बनने की आशंका | international news
फ्रांस में हाल ही में हुए छात्र विरोध-प्रदर्शनों को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है। एक प्रमुख अमेरिकी मीडिया संस्थान की जांच में सामने आया है कि इन प्रदर्शनों के पीछे करीब 50 संगठनों का एक संदिग्घ नेटवर्क सक्रिय था, जिसमें लेबर यूनियन, कम्युनिस्ट और समाजवादी संगठनों के साथ-साथ कुछ राजनीतिक दल भी शामिल थे। इन समूहों पर बाहरी फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आंदोलनों को हवा देने के गंभीर आरोप लगे हैं।
अमेरिकी पत्रकार अस्रा नोमानी ने इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता जताते हुए सोशल मीडिया पर दावा किया है कि फ्रांस के बाद अब इस अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी नेटवर्क का अगला निशाना भारत हो सकता है। उन्होंने विदेशी फंडिंग के जरिए देश के भीतर छात्र संगठनों और वैचारिक मंचों का इस्तेमाल कर माहौल बिगाड़ने की साजिश की आशंका जताई है। रिपोर्ट में शंघाई आधारित कारोबारी नेविल रॉय सिंघम का भी जिक्र किया गया है, जिसके जरिए प्रोपेगैंडा और अभियानों के लिए बड़े पैमाने पर धन मुहैया कराए जाने के आरोप हैं।
इस बीच, देश के कानूनी जगत के दिग्गजों ने भी आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप को लेकर आगाह किया है। पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने भी देश के कुछ आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतों और बाहरी फंडिंग का हाथ होने की आशंका जताई है। उनका कहना है कि इस तरह के प्रयासों का उद्देश्य देश में अस्थिरता पैदा करना है। इस तरह के बाहरी हस्तक्षेप से देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सुरक्षा एजेंसियां भी सतर्क हो गई हैं।
