सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं आईएएस मेधा रूपम, HC के उस आदेश को दी चुनौती जिसमें सैलरी से 5 लाख मुआवजा देने को कहा गया था | up politics news
गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी (डीएम) मेधा रूपम ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक कड़े फैसले के खिलाफ सर्वोच्च अदालत का रुख किया है। यह पूरा मामला नोएडा में हुए एक मजदूर आंदोलन के दौरान 25 वर्षीय छात्रा आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत की गई कार्रवाई से जुड़ा हुआ है। हाई कोर्ट ने इस हिरासत को पूरी तरह से मनमाना और आधारहीन करार देते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया था कि छात्रा को हुए मानसिक उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार अधिकारियों, जिनमें डीएम मेधा रूपम भी शामिल हैं, के वेतन से पांच लाख रुपये का मुआवजा वसूला जाए। इस आदेश के बाद से प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई थी और अब इस मामले की गूंज देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंच गई है [up politics news]।
न्यायालय ने अपने पिछले फैसले में इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई थी कि किस तरह से राज्य तंत्र का इस्तेमाल करके नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की गई। अदालत ने टिप्पणी की थी कि इस तरह का रवैया प्रशासनिक तानाशाही को बढ़ावा देता है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। इस तरह के न्यायिक हस्तक्षेप से यह संदेश जाता है कि कानून का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है। अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि हाई कोर्ट का यह निर्देश कानूनी रूप से कितना सही है और क्या अधिकारियों के वेतन से मुआवजा वसूला जाना चाहिए। इस कानूनी लड़ाई का असर भविष्य में प्रशासनिक अधिकारियों के निर्णय लेने की क्षमता और जवाबदेही पर भी पड़ सकता है।
