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रेप को जेंडर-न्यूट्रल बनाने की PIL पर दिल्ली HC की अहम टिप्पणी, जानें क्या कहा कोर्ट

By Aug 14, 2026

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यौन अपराधों को ‘जेंडर न्यूट्रल’ यानी लिंग-निरपेक्ष घोषित करने की मांग को स्वीकार कर लिया है। इस याचिका में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत सभी लिंगों (महिला, पुरुष, ट्रांसजेंडर) और यहां तक कि पशुओं के साथ होने वाले यौन अपराधों के पीड़ितों के लिए समान कानूनी प्रावधानों की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मौजूदा कानून पुरुषों, ट्रांसजेंडरों या जानवरों के खिलाफ सहमति के बिना होने वाले अप्राकृतिक यौन कृत्यों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि वे केवल पुरुषों द्वारा महिलाओं के खिलाफ किए गए अपराधों पर केंद्रित हैं।

वकील शुभी श्रीवास्तव और अन्य द्वारा दायर इस याचिका पर चीफ जस्टिस डी.के.उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने 7 अक्टूबर को सुनवाई करने की सहमति जताई है। पीठ ने इस मामले में पहले से लंबित अन्य याचिकाओं के साथ इसे भी सूचीबद्ध किया है।

विधायी नीति पर कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान, बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी अपराध को परिभाषित करना ‘विधायी नीति’ का हिस्सा है और इस मामले में अदालत का अधिकार सीमित है। कोर्ट ने कहा, “हम यहां किसी प्रावधान की व्याख्या बदलने या यह तय करने के लिए नहीं बैठे हैं कि क्या अपराध माना जाएगा। आखिरकार, यह फैसला विधायिका को ही लेना है।” बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि अपराधों को परिभाषित करने का काम विधायिका का है, और इसमें अदालत की भूमिका सीमित है।

समानता और कानूनी संरक्षण की मांग

याचिका में यह भी बताया गया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 जैसे प्रावधानों के अभाव में, पुरुषों, ट्रांसजेंडरों और जानवरों को यौन अपराधों के शिकार होने पर महिलाओं के समान कानूनी संरक्षण नहीं मिल पाता है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि इन वर्गों को भी समान अधिकार और सुरक्षा मिलनी चाहिए।

यह जनहित याचिका यौन अपराधों के प्रति समाज की बदलती समझ और कानूनी ढांचे को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। इस पर आगे की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि न्यायपालिका इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और विधायिका के लिए क्या संकेत देती है।

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