लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर टूटा लोगों का भरोसा, पुराने हाईवे पर लौटीं गाड़ियां
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे, जो तेज रफ्तार और कम समय में सफर का वादा करता था, उद्घाटन के बाद से ही समस्याओं से जूझ रहा है। सड़क धंसने, लगातार मरम्मत, डायवर्जन और अधिक टोल शुल्क के कारण बड़ी संख्या में लोग अब पुराने राष्ट्रीय राजमार्ग का उपयोग करने लगे हैं। शुरुआती दिनों में एक्सप्रेसवे का इस्तेमाल करने वाले लगभग 30 फीसदी वाहन फिर से पुराने हाईवे पर लौट आए हैं। हालांकि, एनएचएआई के अधिकारी इसे बड़ी संख्या में जायजा लेने वालों की भीड़ बता रहे हैं और छह महीने बाद औसत ट्रैफिक का आकलन करने की बात कह रहे हैं।
एक्सप्रेसवे के शुरू होने के बाद से अब तक पांच बार सड़क धंसने और क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हर बार मरम्मत के लिए बैरिकेडिंग और डायवर्जन लगाना पड़ा, जिससे तेज और सुगम यात्रा का दावा कमजोर पड़ा है। जाजमऊ के एक लेदर कारोबारी ने बताया कि एक्सप्रेसवे पर एक तरफ का टोल करीब 290 रुपये है, जबकि पुराने हाईवे पर यह लगभग 100 रुपये है।
चार हजार करोड़ से अधिक की लागत से बने इस 63 किमी लंबे एक्सप्रेसवे के निर्माण के दौरान मंत्रालय स्तर पर निगरानी और स्वचलित इंटेलीजेंट मशीनों (एआईएमसी) के इस्तेमाल का दावा किया गया था। यह भी कहा गया था कि अगले 10 साल तक सड़क पर गड्ढे नहीं होंगे और न ही सड़क धंसेगी।
सिक्सलेन रोड और कम ट्रैफिक के कारण फास्टैग पास धारक वाहन चालक अभी भी एक्सप्रेसवे को प्राथमिकता दे रहे हैं, लेकिन बार-बार की तकनीकी दिक्कतों ने यात्रियों का भरोसा जरूर तोड़ा है। परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि एक्सप्रेसवे के पूरी तरह दुरुस्त होने और निर्बाध संचालन के बाद ही लोग बड़ी संख्या में लौटेंगे। एनएचएआई के सूत्रों के अनुसार, पहले रोजाना औसतन 22-24 हजार वाहन गुजरते थे, जो अब घटकर 18-20 हजार रह गए हैं।
एनएचएआई के लखनऊ क्षेत्रीय कार्यालय ने सोशल मीडिया पर आई शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए कहा है कि मरम्मत का काम पूरा हो गया है और एक्सप्रेस-वे पर यातायात सामान्य है। इस स्थिति का सीधा असर यात्रियों की सुविधा और यात्रा की लागत पर पड़ रहा है, जिससे वे पुराने, भरोसेमंद रास्तों की ओर लौट रहे हैं।
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