13 साल गवाह का इंतजार, थककर आरोपी ने कबूल किया जुर्म, UP कोर्ट से मिली प्रोबेशन पर रिहाई
कानपुर में एक अनोखा मामला सामने आया है, जहां बर्रा थाने में 16 साल पहले दर्ज हुए मारपीट के मुकदमे में कोर्ट को 13 साल तक गवाह का इंतजार करना पड़ा। आखिरकार, जब कोई गवाह पेश नहीं हुआ, तो बार-बार कोर्ट के चक्कर लगाकर थक चुके अभियुक्त ने स्वयं ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सप्तम अमित सिंह ने मामले की गंभीरता और लंबी प्रक्रिया को देखते हुए अभियुक्त को छह महीने की परिवीक्षा (Probation) अवधि पर रिहा करने का आदेश दिया। इस रिहाई की शर्त यह है कि अभियुक्त इस परिवीक्षा अवधि के दौरान किसी भी प्रकार के आपराधिक कृत्य में लिप्त नहीं पाया जाएगा।
यह मामला गोरखपुर के इंद्रासन द्वारा 9 जून 2010 को बर्रा थाने में अपने दत्तक पुत्र अमर सिंह उर्फ रामदुलारे के खिलाफ दर्ज कराया गया था। आरोप था कि अमर सिंह की मारपीट और जान से मारने की धमकी से तंग आकर इंद्रासन ने एक साल पहले अपना बर्रा स्थित मकान बेचकर गोरखपुर में बसना शुरू कर दिया था। घटना के दिन, जब वह टेंपो स्टैंड पर थे, अमर सिंह ने उन्हें रोका, गालियां दीं और वहां से चले जाने की धमकी दी, अन्यथा जान से मारने की बात कही। अमर सिंह ने मारपीट भी की, जिसे आसपास के लोगों ने हस्तक्षेप कर रोका।
बर्रा पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल की और 16 अगस्त 2013 को कोर्ट ने अमर सिंह के खिलाफ आरोप तय कर दिए थे। हालांकि, अभियोजन पक्ष अब तक इस मामले में एक भी गवाह को कोर्ट में पेश करने में सफल नहीं हो सका। अभियुक्त के अधिवक्ता कैलाश सैनी ने बताया कि लंबी कानूनी प्रक्रिया और गवाहों की अनुपस्थिति से परेशान होकर अमर सिंह ने स्वयं ही अपना गुनाह स्वीकार करने का निर्णय लिया। कोर्ट ने उसे दोषी करार देते हुए 20 हजार रुपये के निजी मुचलके पर छह महीने की प्रोबेशन पर रिहा किया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि अभियुक्त परिवीक्षा अवधि के दौरान किसी भी आपराधिक कृत्य में लिप्त पाया जाता है, तो उसे इस मामले में निर्धारित सजा भुगतनी पड़ सकती है। इस देरी से न्याय प्रणाली पर सवाल उठते हैं और आम आदमी को होने वाली परेशानी उजागर होती है।
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