लखनऊ अग्निकांड: 8 साल में 12 मौतें, फिर भी दोषी जेल से बाहर, जानिए क्यों
लखनऊ के अलीगंज में हाल ही में हुई भीषण आग की घटना ने एक बार फिर शहर में इमारतों की सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस अग्निकांड में 15 से अधिक लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने के बाद, यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी?
यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी लखनऊ में चारबाग के एसएसजे इंटरनेशनल, विराट होटल और लेवाना होटल जैसे हादसों में 40 से अधिक अधिकारी-कर्मचारी दोषी पाए गए थे। इन घटनाओं में 40 से अधिक लोगों की जान गई थी। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि दोषी ठहराए जाने के बावजूद, न तो किसी को जेल हुई और न ही किसी को नौकरी से बर्खास्त किया गया। सभी आरोपियों को क्लीन चिट मिल चुकी है, जो न्याय व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
आठ साल बाद भी न्याय का इंतजार
चारबाग के एसएसजे इंटरनेशनल और विराट होटल में हुए भीषण अग्निकांड को आठ साल बीत चुके हैं। इस हादसे में आठ लोगों की जान गई थी। जांच समिति ने 40 से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों को दोषी ठहराया था। इसके बावजूद, न तो किसी को सजा मिली और न ही किसी को नौकरी से निकाला गया। सभी आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गई। यह घटना 18-19 जून 2018 की रात को हुई थी और इसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था।
जांच रिपोर्टों का क्या हुआ?
मुख्यमंत्री के निर्देश पर तत्कालीन एडीजी राजीव कृष्ण की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की गई थी। समिति ने चार महीने में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। इस रिपोर्ट में कई अधिकारियों और कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराया गया था। लेकिन रिपोर्ट के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पीड़ित परिवारों को आज भी इंसाफ का इंतजार है।
लेवाना अग्निकांड: अनवरत देरी
लेवाना सुइट होटल अग्निकांड में चार युवाओं की दर्दनाक मौत के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों और इंजीनियरों पर कार्रवाई का इंतजार खत्म नहीं हुआ। जांच में निर्माण से लेकर संचालन तक गंभीर अनियमितताएं सामने आई थीं। लेकिन वर्षों बाद भी अधिकांश लोग कार्रवाई से बच निकले। बाद में पांच और अधिकारियों के नाम शासन को भेजे गए, लेकिन दोषियों को बचाने का खेल जारी रहा।
अवैध निर्माण पर भी सवाल
हालिया अलीगंज अग्निकांड के बाद, जिस भवन में आग लगी थी, उसके अवैध निर्माण के पुराने दस्तावेज और प्राधिकरण की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में है। वर्ष 2016 में इस भवन के खिलाफ अवैध निर्माण को लेकर ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया था, लेकिन कुछ ही महीनों में उस आदेश को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद बिल्डिंग का ध्वस्तीकरण नहीं किया गया, जो एक बड़ी लापरवाही को दर्शाता है।
इस तरह की घटनाएं न केवल जान-माल का नुकसान करती हैं, बल्कि सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। जब तक दोषियों को सजा नहीं मिलेगी, तब तक ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना मुश्किल होगा।
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