लखनऊ में Jagjit Singh की गजलों से सजी शाम, संगीत प्रेमियों ने दी श्रद्धांजलि
लखनऊ के संगीत प्रेमियों ने रविवार को एक भावपूर्ण शाम का अनुभव किया। जयपुरिया इंस्टीट्यूट के प्रेक्षागृह में ‘कागज़ की कश्ती-जगजीत सिंह का एक म्यूज़िकल पोर्ट्रेट’ का मंचन हुआ, जिसने दिवंगत ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह की यादों को ताज़ा कर दिया। राजीव प्रधान प्रोडक्शन्स की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में जगजीत सिंह की गजलों और जीवन की कहानी का सुंदर मिश्रण प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत जगजीत सिंह की प्रसिद्ध गजल ‘तुम को देखा तो ये ख्याल आया’ से हुई। इसके बाद, डॉ. सुधांशु मणि ने अपनी प्रभावशाली आवाज में जगजीत सिंह के जीवन से जुड़े किस्से सुनाए। डॉ. प्रभा श्रीवास्तव ने अपनी मधुर गायकी से इन कहानियों को संगीतबद्ध किया। उनके साथ संगतकारों की एक कुशल टीम थी, जिसमें तबले पर नितीश, सारंगी पर जीशान, सिंथेसाइज़र पर रिंकू, गिटार पर राकेश आर्य और परकशंस पर दीपक शामिल थे।
डॉ. प्रभा श्रीवास्तव ने जगजीत सिंह द्वारा गाई गई कई यादगार गजलें पेश कीं। इनमें कतील शिफाई की ‘किया है प्यार जिसे हमने जिंदगी की तरह’, कफील अमरोहवी की ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’, फिराक गोरखपुरी गोरखपुरी की ‘तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं’ और इब्न-ए-इंशा की ‘कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा’ शामिल थीं।
शाम का एक खास आकर्षण मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी रही, जिसे जगजीत सिंह ने गुलज़ार के मशहूर धारावाहिक में आवाज़ दी थी। ‘बाजीचा-ए-अतफाल है दुनिया मेरे आगे’ और ‘दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त’ जैसी गजलों ने श्रोताओं को भावुक कर दिया। इसके अलावा, ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ और पंजाबी गीत ‘कोठे उत्ते आ माहिया’ ने भी महफ़िल का रंग जमाया।
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