लखनऊ के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों, केजीएमयू और लोहिया संस्थान के कैंसर रोग विभाग की ओपीडी में सामने आए तथ्यों के अनुसार, कैंसर के 40 प्रतिशत मरीज इलाज शुरू करने को लेकर भ्रम की स्थिति में...
लखनऊ के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों, केजीएमयू और लोहिया संस्थान के कैंसर रोग विभाग की ओपीडी में सामने आए तथ्यों के अनुसार, कैंसर के 40 प्रतिशत मरीज इलाज शुरू करने को लेकर भ्रम की स्थिति में रहते हैं। बीमारी की पुष्टि होने के बाद भी मरीज यह तय नहीं कर पाते कि उन्हें किस विशेषज्ञ से इलाज कराना चाहिए। इस गफलत के कारण 20 प्रतिशत मरीज सही डॉक्टर की तलाश में कीमती समय गंवा देते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, 25 प्रतिशत मरीज गैर-विशेषज्ञ डॉक्टरों के निर्देशन में इलाज शुरू करते हैं। केवल 15 फीसदी मरीज ही सही समय पर सटीक इलाज करा पाते हैं। डॉक्टरों ने बताया कि 80 प्रतिशत मरीज बायोप्सी जांच कराने से कतराते हैं, जबकि यह जांच ट्यूमर और कैंसर के प्रकार को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। बायोप्सी के बिना सही ‘cancer treatment’ शुरू करना मुश्किल होता है।
ओरल कैंसर: तंबाकू सिर्फ आदत नहीं, जीन बदलने वाला जहर
विशेषज्ञों ने ओरल कैंसर के बढ़ते मामलों पर भी चिंता जताई। तंबाकू को आमतौर पर एक बुरी आदत माना जाता है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यह शरीर की कोशिकाओं और जीन को बदलने की क्षमता रखता है। गुटखा, खैनी और स्मोकलेस तंबाकू सिगरेट से भी अधिक खतरनाक हैं, क्योंकि ये लंबे समय तक मुंह के टिशू के संपर्क में रहते हैं।
दर्द न होना सबसे बड़ा खतरा
ओरल कैंसर की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसके शुरुआती लक्षणों में दर्द नहीं होता। मुंह में छोटा सा सफेद दाग या छाला होने पर मरीज इसे सामान्य समझकर महीनों तक अनदेखा करते रहते हैं। परिणामस्वरूप, 60 से 70 प्रतिशत मामले अंतिम स्टेज में सामने आते हैं, जब इलाज जटिल हो जाता है।
डॉक्टरों के अनुसार, तंबाकू छोड़ने से कैंसर का जोखिम 70 से 80 प्रतिशत तक कम हो जाता है। यदि बीमारी शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए, तो 90 प्रतिशत से अधिक मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं।