मकर संक्रांति का ‘हमर तिलकट बहबही ना’ वादा: पीढ़ियों को जोड़ती परंपरा
मकर संक्रांति का त्योहार आते ही गांवों में ‘हमर तिलकट बहबही ना’ की एक अनूठी परंपरा जीवित हो उठती है। यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाला एक भावनात्मक सेतु है। इस दिन घर के बड़े-बुजुर्ग बच्चों की हथेली पर तिल, गुड़ और चावल का मिश्रण (तिलकट) रखते हैं और तीन बार पूछते हैं, ‘हमर तिलकट बहबही ना?’ बच्चों का ‘हां, हां, हां’ में जवाब एक वादे के समान होता है।
यह परंपरा बचपन की देखभाल और बुढ़ापे के सहारे का प्रतीक है। ‘हमर तिलकट बहबही ना’ शब्दों में बुजुर्गों की उम्मीद, भरोसा और जीवन भर का अपनापन छिपा होता है। यह बिना किसी उपदेश के बच्चों को जिम्मेदारी का एहसास कराती है, जो ग्रामीण समाज में एक सामाजिक अनुबंध की तरह काम करता है।
आज के दौर में, जहां परिवार छोटे हो रहे हैं और रिश्ते औपचारिक होते जा रहे हैं, ऐसी परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं। शहरों में मकर संक्रांति अक्सर पतंग और मिठाइयों तक सीमित रह जाती है, जबकि इसका भावनात्मक पक्ष कहीं पीछे छूट जाता है।
इसके बावजूद, गांवों में आज भी यह परंपरा पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है। बुजुर्गों की आंखों में भरोसा झलकता है और बच्चों की हथेली में सिर्फ तिलकट नहीं, बल्कि परिवार की जिम्मेदारी रखी जाती है। यह मकर संक्रांति की असली भावना है, जहां स्वाद से ज्यादा संस्कार और पर्व से ज्यादा रिश्तों का महत्व है।
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