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धराली आपदा: कर्नल कोठियाल का दावा, 147 लोग फंसे, 62 का आंकड़ा गलत

By Dec 3, 2025

उत्तराखंड के भाजपा नेता और पूर्व सैनिक कल्याण सलाहकार समिति के अध्यक्ष कर्नल अजय कोठियाल (सेनि) ने धराली आपदा में हताहतों की संख्या को लेकर एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा है कि आपदा में 62 लोगों के मलबे में दबे होने की आधिकारिक संख्या गलत है और असल में यह आंकड़ा 147 तक हो सकता है। कर्नल कोठियाल का यह बयान इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हो रहा है, जिसमें वे आपदा प्रबंधन के तौर-तरीकों पर भी सवाल उठा रहे हैं।

कर्नल कोठियाल ने कहा कि धराली आपदा को वैज्ञानिकों ने एक ‘ब्लैम गेम’ बना दिया है, जहां केवल यह चर्चा हो रही है कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि धराली, जो आपदा का प्रथम गांव है, उसे पूरी तवज्जो मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इस आपदा को एक शोध गतिविधि के अवसर के रूप में देखा जा सकता है, जहां वाडिया इंस्टीट्यूट और यूकोस्ट जैसे संस्थान शोधार्थी कैंप लगा सकते हैं।

अपने बयान में कर्नल कोठियाल ने प्रभावितों के प्रति गहरी सहानुभूति व्यक्त की। उन्होंने कहा कि लोगों का सामान, बच्चों की डिग्रियां, घर और यहां तक कि किसी की पत्नी का मंगलसूत्र भी मलबे में दबा हो सकता है, ऐसे में उन्हें कैसे छोड़ा जा सकता है। यह मानवीय जुड़ाव और प्रभावितों की निजी वस्तुओं की बरामदगी के महत्व को रेखांकित करता है।

धराली आपदा संघर्ष समिति के अध्यक्ष सचेंद्र पंवार ने भी कर्नल कोठियाल के बयान का समर्थन किया है, जो इस मुद्दे पर बढ़ते असंतोष को दर्शाता है।

एक अन्य माध्यम से, कर्नल कोठियाल ने अपने एक्स (ट्विटर) अकाउंट पर भी इस मामले पर विचार व्यक्त किए। ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी देहरादून में आयोजित ‘वर्ल्ड समिट ऑन डिजास्टर मैनेजमेंट’ में बोलते हुए उन्होंने कहा कि आपदा के चार महीने बीत जाने के बाद भी उत्तरकाशी जिले के धराली कस्बे की बदहाली उनकी ‘नकारात्मक सोच’ का प्रमाण है। उनके अनुसार, इस ‘नकारात्मक सोच’ से उनका तात्पर्य उन जिम्मेदार अधिकारियों, भू-गर्भ वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और संस्थानों से है, जो पुनर्वास के उचित रास्ते खोजने के बजाय चुनौतियों से बचने के बहाने तलाशते हैं।

कर्नल कोठियाल ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की सोच का सबसे ज्यादा खामियाजा उन पीड़ितों को भुगतना पड़ता है, जो पहले से ही आपदा की मार से बुरी तरह टूट चुके होते हैं। उन्होंने इस ‘नकारात्मक सोच’ से बाहर निकलने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया ताकि प्रभावितों को उचित सहायता और न्याय मिल सके।

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