सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जमानत के लिए समानता एकमात्र आधार नहीं
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आपराधिक मामलों में आरोपी को जमानत देते समय समानता का सिद्धांत ही एकमात्र आधार नहीं हो सकता। शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जमानत देते समय अपराध की प्रकृति, परिस्थितियों और आरोपी की भूमिका जैसे प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करना अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा हत्या के एक मामले में दिए गए जमानत आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। उच्च न्यायालय ने एक आरोपी को इसलिए जमानत दे दी थी क्योंकि उसके सह-आरोपी को इसी आधार पर जमानत मिल चुकी थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ के सिद्धांत को भले ही राहत देने के लिए माना जाता हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जमानत की राहत अपराध की परिस्थितियों पर समुचित ध्यान दिए बिना ही दी जाए। पीठ ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय ने उस आरोपी को केवल इस आधार पर जमानत दे दी कि उसके सह-आरोपी को भी जमानत मिल गई थी, जो कि कानून की सही स्थिति नहीं है।
अदालत ने कहा कि समानता का उद्देश्य आरोपी की भूमिका और अपराध में उसकी संलिप्तता पर ध्यान केंद्रित करना होना चाहिए, न कि केवल इस तथ्य पर कि वह एक ही अपराध में सह-आरोपी है। कैम्ब्रिज शब्दकोश में ‘पैरिटी’ (समानता) शब्द को अक्सर वेतन या पद की बराबरी के संदर्भ में परिभाषित किया गया है, लेकिन आपराधिक न्याय प्रणाली में जमानत का निर्णय इससे कहीं अधिक व्यापक होता है।
यह मामला उत्तर प्रदेश के एक गांव में हुई हत्या से संबंधित था, जो स्थानीय कहासुनी के बाद भड़की थी। इस मामले में, एक आरोपी को जमानत मिल चुकी थी और दूसरे सह-आरोपी को समानता के आधार पर राहत दे दी गई थी। शीर्ष अदालत ने इस प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण मानते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने जमानत देते समय सभी प्रासंगिक बातों पर विचार नहीं किया और केवल समानता को ही एकमात्र आधार बना लिया, जबकि यह जमानत का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
शीर्ष अदालत ने अपने 28 नवंबर के फैसले में इस बात को रेखांकित किया कि जमानत देते समय न्यायाधीशों को कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करना होता है, जैसा कि पूर्व में कई फैसलों में स्पष्ट किया गया है। अपराध की गंभीरता, गवाहों पर प्रभाव, आरोपी के भागने का खतरा और अन्य संबंधित कारक जमानत देने या न देने के निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस फैसले से जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश स्थापित हुआ है।
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