बिहार विधानसभा में वंशवाद की तीसरी पीढ़ी का आगमन: नई राजनीतिक विरासत की ओर
बिहार की राजनीति में वंशवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार 18वीं विधानसभा में एक नया अध्याय जुड़ा है जहाँ राजनीतिक विरासत की तीसरी पीढ़ी के विधायक भी सदन में पहुंचे हैं। यह दर्शाता है कि कैसे राजनीतिक परिवार अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी सदन में अपना प्रतिनिधित्व बनाए हुए हैं।
सारण के परसा से राजद की विधायक करिश्मा राय, कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय की पौत्री हैं। दारोगा राय की पत्नी विधायक रह चुकी हैं और उनके पुत्र चंद्रिका राय भी परसा से कई बार विधायक चुने गए थे। करिश्मा राय की जीत, दारोगा राय परिवार के लिए कुल मिलाकर नौवीं जीत है, जो राजनीतिक विरासत की लंबी श्रृंखला को दर्शाती है।
इस्लामपुर से जदयू के विधायक रूहेल रंजन भी तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके दादा रामशरण सिंह कांग्रेस के कद्दावर नेता थे, जिन्होंने मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला था। उनके पिता राजीव रंजन भी इस्लामपुर के विधायक रहे थे। इसी तरह, कुशेश्वर स्थान से जदयू के टिकट पर जीते अतिरेक कुमार के दादा बालेश्वर राम सांसद और विधायक थे, जिन्होंने केंद्र सरकार में मंत्री पद भी संभाला था। अतिरेक के पिता डॉ. अशोक कुमार भी राज्य सरकार में मंत्री रह चुके हैं और छह बार विधायक चुने गए थे।
भाजपा के दानापुर विधायक और कृषि मंत्री, जिन्होंने हाल ही में विधायक पद की शपथ ली, वे भी एक ऐसे परिवार से आते हैं जिनका राजनीति से गहरा नाता रहा है। वे विधान परिषद, राज्यसभा और लोकसभा के सदस्य रहने के साथ-साथ पटना के निगम पार्षद और डिप्टी मेयर भी रह चुके हैं।
यह चलन केवल कुछ परिवारों तक सीमित नहीं है। राजद के तेजस्वी यादव के अलावा, जमुई से भाजपा की विधायक श्रेयसी सिंह के पिता स्व. दिग्विजय सिंह सांसद और केंद्रीय मंत्री थे, जबकि उनकी मां पुतुल देवी भी बांका से सांसद रह चुकी हैं। नवीनगर से जदयू के विधायक चेतन आनंद के पिता आनंद मोहन सांसद-विधायक रह चुके हैं और उनकी मां लवली आनंद वर्तमान में सांसद हैं और दो बार विधायक भी रह चुकी हैं।
यह स्थिति बिहार की राजनीति में वंशवाद की गहरी जड़ों और उसके निरंतर विस्तार को उजागर करती है। ऐसे विधायकों का सदन में पहुंचना, जहाँ उनके परिवार का राजनीतिक इतिहास रहा है, यह दर्शाता है कि कैसे राजनीतिक विरासतें पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही हैं और जनता का विश्वास जीतने में सफल हो रही हैं। यह बिहार की राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
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