विश्व पुस्तक मेला 2026: वैश्विक साहित्य का संगम, सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर जोर
विश्व पुस्तक मेला 2026 का इंटरनेशनल इवेंट्स कॉर्नर वैश्विक साहित्यिक संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जहाँ यूरोप, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया और अमेरिका के लेखक, कवि, शिक्षाविद्, नाटककार, अनुवादक और संस्कृतिकर्मी एक साथ जुड़े।
इस मंच ने संवाद सत्रों, रचना पाठों और पुस्तक लोकार्पणों के माध्यम से साहित्य को सांस्कृतिक आदान-प्रदान, ऐतिहासिक आत्मचिंतन और समकालीन विमर्श के एक जीवंत माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया। इसने अंतरराष्ट्रीय विचारों और रचनात्मक परंपराओं के संगम स्थल के रूप में मेले की भूमिका को और सुदृढ़ किया।
साहित्य और जीवन के अनुभवों के आपसी संबंध, विशेषकर प्रकृति, स्मृति और विस्थापन के संदर्भों में, कई सत्रों का प्रमुख विषय रहे। रूसी लेखक इल्या कोचेर्गिन ने लेखन को प्राकृतिक जगत के साथ संवाद के रूप में देखा, जहाँ मानव और गैर-मानव जीवन का मिलन होता है।
आधुनिक अलगाव (एलियनेशन) की स्थितियों के प्रति उत्तरदायी साहित्यिक रूपों की आवश्यकता पर बल दिया गया, साथ ही सहअस्तित्व और देखभाल से जुड़ी नैतिक चेतना को बनाए रखने की बात कही गई। अनुकूलन और सांस्कृतिक अनुवाद की भूमिका भी प्रमुख रही।
‘छोटा राजकुमार’ नामक पुस्तक के भारतीय भाषा में चित्र-पुस्तक रूपांतरण के लोकार्पण से यह स्पष्ट हुआ कि कैसे कालजयी रचनाएं विचारशील पुनर्कल्पना के माध्यम से संस्कृतियों के बीच यात्रा करती हैं। अनुष्का रविशंकर के अनुवाद/अनुकूलन और प्रिया कुरियन के चित्रांकन ने दिखाया कि दृश्य भाषा, संक्षिप्त कथानक और सांस्कृतिक संदर्भ मिलकर किसी वैश्विक कृति को युवा पाठकों के लिए नया जीवन कैसे दे सकते हैं।
कविता और बहुभाषिक अभिव्यक्ति भी अंतरराष्ट्रीय संवादों का एक सशक्त माध्यम रहीं। स्पेनिश, भारतीय और मध्य एशियाई स्वरों के सत्रों में साझा आधुनिकतावादी परंपराओं और काव्य-रूप की स्थायी प्रासंगिकता पर विचार हुआ। फेडेरिको गार्सिया लोर्का और भारतीय कवि जीवनानंद दास पर हुई चर्चा ने भाषायी और राष्ट्रीय सीमाओं के पार साहित्यिक प्रभावों के प्रवाह को रेखांकित किया।
अनुवाद एक केंद्रीय चिंता के रूप में उभरा, विशेषकर यह प्रश्न कि कविता विभिन्न भाषाओं में भावनात्मक और सांस्कृतिक गहराई कैसे बनाए रखती है। स्पेनिश, बास्क, कैटलन, बांग्ला और हिंदी में हुए काव्य-पाठों ने स्पष्ट किया कि भाषायी बहुलता समकालीन साहित्यिक आदान-प्रदान की अनिवार्य विशेषता है।
बाल साहित्य और शिक्षाशास्त्र पर भी अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोणों से चर्चा हुई, जिनमें सुलभता और भावनात्मक संवेदनशीलता पर जोर दिया गया। इज़राइली शिक्षाविद् आइरिस आर्गामन ने बच्चों के लिए बड़े ऐतिहासिक आख्यानों को अंतरंग और पठनीय रूपों में ढालने की प्रक्रिया पर बात की, और पठन को जिज्ञासा व कल्पना पर आधारित अनुभव के रूप में रेखांकित किया।
स्मृति, पहचान और अपनत्व के प्रश्न भी कई अंतरराष्ट्रीय संवादों में गूंजते रहे। कज़ाख़स्तान के लेखकों और विद्वानों ने चर्चा की कि व्यक्तिगत और सामूहिक स्मृतियां राष्ट्रीय आख्यानों को कैसे आकार देती हैं, विशेषकर उपनिवेशोत्तर और पोस्ट-सोवियत संदर्भों में। साहित्य को निरंतरता और परिवर्तन के बीच संवाद का माध्यम बताया गया।
रूसी नाटककार यारोस्लावा पुलिनोविच ने समकालीन रंगमंच को दैनिक भावनात्मक वास्तविकताओं का दर्पण बताया, जहाँ संवेदनशीलता, युवावस्था और लचीलापन जैसे विषय उभरते हैं। उन्होंने नाटक को ऐसा क्षेत्र बताया जहाँ यथार्थ और कल्पना सह-अस्तित्व में रहते हैं।
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