कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क का क्या है इतिहास और कैसे बदली इस जमीन की सूरत | delhi news
दिल्ली का कनॉट प्लेस और इसके बीचोंबीच स्थित सेंट्रल पार्क आज देश की राजधानी की सबसे व्यस्त और प्रतिष्ठित जगहों में गिने जाते हैं। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में इस पूरे इलाके में सिर्फ घने जंगल और छोटे-छोटे गांव हुआ करते थे। दूर-दूर तक फैले बबूल, पीपल और बरगद के पेड़ों के बीच केवल एक प्राचीन हनुमान मंदिर और जंतर-मंतर ही प्रमुख पहचान हुआ करते थे। पुराने समय में इस इलाके को शाहजहांनाबाद के लोगों द्वारा शिकारगाह के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था।
यह पूरी जमीन मूल रूप से जयपुर के तत्कालीन शासकों के स्वामित्व में थी। मुगल काल के दौरान राजा सवाई जयसिंह को यह क्षेत्र दिया गया था, जहां जयसिंहपुरा और राजा का बाजार जैसे प्रमुख गांव बसे हुए थे। साल 1912 में जब दिल्ली को देश की नई राजधानी के रूप में विकसित करने और इसके विस्तार की योजना बनी, तब प्रशासन ने इन जमीनों का अधिग्रहण शुरू किया। यहाँ रहने वाले मूल निवासियों को करोल बाग और पहाड़गंज के नए इलाकों में बसाया गया और इसके बाद आधुनिक शहर की नींव रखी गई।
ब्रिटिश वास्तुकारों द्वारा डिजाइन किया गया यह बाजार जॉर्जियन शैली में तैयार किया गया था, जिसका निर्माण कार्य 1929 में शुरू होकर 1933 में पूरा हुआ। ब्रिटेन के ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर इस व्यावसायिक केंद्र का नाम कनॉट प्लेस रखा गया। समय के साथ यहाँ किताबों की प्रसिद्ध दुकानों से लेकर देश-विदेश के बड़े ब्रांड और कॉफी हाउस खुलने लगे, जिससे यह दिल्ली का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र बन गया।
आज जहाँ हरा-भरा सेंट्रल पार्क दिखाई देता है, उसका आधुनिक स्वरूप साल 2006 में तैयार हुआ था। राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के निर्माण कार्य के चलते इस भूभाग को नए सिरे से विकसित किया गया। दिल्ली मेट्रो रेल निगम द्वारा इस भूमिगत स्टेशन के ऊपर लगभग 27 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में भव्य पार्क का निर्माण किया गया, जिसमें विभिन्न प्रजाति के पौधे, फव्वारे और एक एम्फीथिएटर शामिल किया गया। यह पार्क आज न सिर्फ शहर के बीच एक शांत विश्राम स्थल है, बल्कि राष्ट्रीय आयोजनों का भी मुख्य केंद्र बन चुका है।
