3 साल से गायब है देश की उच्च शिक्षा रिपोर्ट, डेटा के बिना कैसे बन रही हैं नीतियां?
क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में उच्च शिक्षा की नीतियां कैसे बनती हैं? खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की युवा महिलाओं के लिए कॉलेज नामांकन दर क्या है? इन सभी सवालों का जवाब AISHE (All India Survey on Higher Education) की रिपोर्ट में होता है। लेकिन पिछले तीन सालों से यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट गायब है। 2021-22 के बाद से, 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं।
शिक्षा मंत्रालय का आधिकारिक पोर्टल बताता है कि डेटा संकलन और संकलन प्रगति पर है, लेकिन प्रकाशन की कोई समयसीमा नहीं दी गई है। एक RTI के जवाब में भी यही कहा गया कि “संकलन प्रगति पर है”। यह देरी तकनीकी सत्यापन के कारण हो सकती है, लेकिन मंत्रालय को कम से कम अनंतिम डेटा जारी करना चाहिए ताकि नीति निर्माताओं को कुछ मार्गदर्शन मिल सके।
AISHE की ताकत इसके विस्तृत डेटा में है – लिंग, जाति, धर्म, विषय और ग्रामीण-शहरी विभाजन के आधार पर आंकड़े। 2021-22 की रिपोर्ट में 43.3 मिलियन छात्रों का नामांकन और 28.4 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात दर्ज किया गया था, साथ ही शिक्षक-छात्र अनुपात में गिरावट और हजारों रिक्त पदों की जानकारी भी थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक गंभीर स्थिति है। मिरांडा हाउस की एसोसिएट प्रोफेसर आभा देव हबीब के अनुसार, “NEP (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) के बाद, हमारे पास नामांकन रुझानों, लिंग अनुपात या ग्रामीण भागीदारी की स्पष्ट तस्वीर नहीं है। उच्च शिक्षा विधेयक 2025 और अन्य नीतियों पर निर्णय बिना किसी सबूत के लिए जा रहे हैं।” डेटा की अनुपस्थिति में, भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था अंधेरे में आगे बढ़ रही है, जिससे भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
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