सीतापुर में रचित ‘सुदामा चरित’: कृष्ण-सुदामा की अमर मित्रता की गाथा, नरोत्तमदास की कालजयी रचना
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के सिधौली ब्लॉक के बाड़ी नामक छोटे से गाँव में महाकवि नरोत्तमदास ने ‘सुदामा चरित’ की रचना की, जो श्रीकृष्ण और उनके बालसखा सुदामा की अमर मित्रता की गाथा है। यह खंडकाव्य कभी हाईस्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा हुआ करता था और आज भी असंख्य साहित्यप्रेमियों को कंठस्थ है।
‘सुदामा चरित’ में महाकवि नरोत्तमदास ने कृष्ण की करुणा और सुदामा की दयनीय स्थिति को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है। ब्रजभाषा में रचित यह काव्य भावों की सरसता और कथा की नाटकीयता के कारण आज भी प्रासंगिक है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ. रामकुमार वर्मा जैसे विद्वानों ने इसकी सरल, सरस भाषा और श्रेष्ठ कथा-संगठन की प्रशंसा की है। यह रचना साहित्य की महानता के लिए स्थान या संसाधनों की मोहताज न होने का संदेश देती है।
जनश्रुतियों के अनुसार, ‘रामचरितमानस’ के रचयिता तुलसीदास भी नैमिषारण्य जाते समय एक रात के लिए नरोत्तमदास की कुटिया में ठहरे थे, जिससे बाड़ी गांव का महत्व और बढ़ जाता है। पर्यटन विभाग ने यहां नरोत्तमदास की जन्मस्थली पर एक स्मारक विकसित किया है, जिसमें उनकी समाधि, कुटिया और सभागार शामिल हैं।
नरोत्तमदास ने कृष्णमार्गी काव्यों में अपने प्रभावशाली छंद प्रयोग और भावनात्मक गहराई के लिए विशेष स्थान प्राप्त किया। ‘सुदामा चरित’ उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है, हालांकि ‘विचार माला’, ‘नाम-संकीर्तन’ और ‘ध्रुव चरित’ जैसी अन्य रचनाओं का भी उल्लेख मिलता है। महाकवि के जीवनवृत्त को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन उनका साहित्यिक अवदान निर्विवाद रूप से कालजयी है।
